हाल ही में एक वरिष्ठ नेता ने देश के दूसरे बड़े नेता के प्रति अपशब्द कहे.इस पर स्वाभाविक ही विवाद हो गया. भारतीय राजनीति में यह गिरावट दुर्भाग्यपूर्ण है. दरअसल, भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेद हमेशा रहे हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने की भाषा में आई गिरावट चिंताजनक है. असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब तर्क की जगह अपशब्द और नीतियों की आलोचना की जगह व्यक्तिगत हमले लेने लगें, तब राजनीति की दिशा पर सवाल उठना लाजिमी है.एक समय भारतीय राजनीति में बड़े नेता अपने विरोधियों की तीखी आलोचना करते हुए भी भाषा की मर्यादा का ध्यान रखते थे. नेहरू युग की तो बात छोड़ दें, इंदिरा गांधी के दौर में भी प्रधानमंत्री अपने भाषणों में प्राय: किसी नेता का नाम लिए बिना उसकी नीतियों और विचारों पर सवाल उठाती थीं. विपक्ष में अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख और मधु दंडवते जैसे नेता भी वैचारिक असहमति को गरिमा के साथ व्यक्त करते थे. इसका अर्थ यह नहीं कि उस दौर में राजनीतिक कटुता नहीं थी, लेकिन तर्क और विचारों के आधार पर विरोध जताने की अपेक्षा जरूर की जाती थी.
आज सोशल मीडिया की लोकप्रियता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सुर्खियों में बने रहने की होड़ ने नेताओं की भाषा को अधिक आक्रामक बना दिया है. चिंता की बात यह है कि यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं है. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय पार्टियां, व्यक्तिगत हमलों और अमर्यादित टिप्पणियों के उदाहरण सभी ओर दिखाई देते हैं. दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि कई बार दल अपने नेताओं की अनुचित भाषा पर सवाल उठाने के बजाय उसका बचाव करने लगते हैं. इससे अभद्रता को राजनीतिक साहस और आक्रामकता के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति बढ़ती है. लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का दायित्व केवल चुनाव जीतना और सरकार बनाना नहीं, बल्कि समाज के सामने आचरण के मानक प्रस्तुत करना भी है. शीर्ष नेताओं की भाषा का असर कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर पड़ता है. जब सार्वजनिक जीवन में मर्यादा टूटती है, तो सामाजिक संवाद में कटुता और विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णुता बढ़ती है. असहमति को शत्रुता में बदल देना स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकता.
भारतीय मतदाता नेताओं को केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि उनके कामकाज, नीतियों और सार्वजनिक आचरण से भी परखता है. अभद्र टिप्पणियां कुछ समय के लिए सुर्खियां बटोर सकती हैं, लेकिन इससे महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जरूरी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना चाहिए कि व्यक्तिगत हमलों की प्रतिस्पर्धा में वे जनता के सवालों से कितनी दूर जा रहे हैं.
राजनीति में मतभेद विचारों, नीतियों और कार्यप्रणाली पर होने चाहिए, व्यक्तिगत स्तर पर नहीं. विपक्ष को सरकार की जवाबदेही तय करने और उसकी नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, वहीं सत्ता पक्ष को भी सवालों का जवाब तर्क और उपलब्धियों के आधार पर देना चाहिए. आलोचना और अपमान के बीच स्पष्ट अंतर है, जिसे सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा. अब समय आ गया है कि सभी दल अपने नेताओं और प्रवक्ताओं के लिए भाषा की स्पष्ट मर्यादा तय करें. अनुचित टिप्पणियों पर दूसरे दलों को घेरने के साथ अपने नेताओं के आचरण की समीक्षा भी होनी चाहिए. राजनीति की गरिमा बनाए रखना सभी दलों की साझा जिम्मेदारी है.
