
ग्वालियर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा सड़कों के रखरखाव और गुणवत्ता में घोर लापरवाही बरतने पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने यह आदेश कैलाश चंद्र अग्रवाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में पारित किया है। सुनवाई के दौरान एनएचएआई की ओर से पेश की गई अंतरिम रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि उनके द्वारा मेंटेन की जा रही सड़क तय मानकों और स्पेसिफिकेशन के अनुरूप नहीं पाई गई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि कंसेशनरी को एनएचएआई द्वारा दी जाने वाली 26.53 करोड़ रुपये की एनुइटी की अगली किस्त का भुगतान फिलहाल रोक दिया जाए। अदालत ने निर्देश दिया है कि इस राशि को किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स डिपॉजिट के रूप में रखा जाए ताकि यदि भविष्य में कंसेशनरी इसके योग्य पाया जाता है तो वह उसे अर्जित ब्याज सहित मिल सके। इसके साथ ही अदालत ने प्रोजेक्ट डायरेक्टर को अगली तारीख पर एफडीआर तैयार किए जाने की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एनएचएआई के अधिकारियों के आचरण पर भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने पाया कि प्रोजेक्ट डायरेक्टर स्वयं आगे आने के बजाय चुपचाप पीछे बैठे रहे और अपने एक कनिष्ठ अधिकारी को न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने के लिए भेजा। अदालत ने एनएचएआई अधिकारियों को सख्त चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया कि वे अपनी कार्यशैली में सुधार करें। इसके अलावा, एनएचएआई के वकील द्वारा बिना पढ़े और आँख मूँद कर गलत रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने के मामले में भी अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद वकील ने उन प्रतिकूल टिप्पणियों को वापस लेने और हटाने का आग्रह किया।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने मध्य प्रदेश आबकारी नियमों के तहत शहरी निकायों (नगर निगम, पालिका और पंचायत) की सीमाओं के भीतर स्थित शराब की दुकानों को राष्ट्रीय या राज्य राजमार्गों के बाहरी छोर से 500 मीटर की अनिवार्य दूरी के नियम से छूट देने के प्रावधान पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि शहरी सीमाओं के भीतर और बाहर की शराब की दुकानों के बीच ऐसा क्या अंतर है, जिसके आधार पर यह वर्गीकरण किया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को तय की गई है, जिसमें नगर निगम ग्वालियर द्वारा गड्ढों को भरने और मरम्मत कार्यों के विवरण पर विचार किया जाएगा।
