
बालाघाट, बैहर-बिरसा क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की मौतों के मामले की जमीनी पड़ताल के लिए पहुंचे CJP प्रमुख अभिजीत दिपके के साथ हुए घटनाक्रम ने अब नया विवाद खड़ा कर दिया है। आरोप है कि प्रभावित ग्राम में बाहर से आए कुछ सोशल मीडिया इंफ्लुएंसरों ने उन्हें पीड़ित परिवारों से मिलने से रोकते हुए आपत्ति जताई और कहा कि वे “लाशों पर राजनीति करने” आए हैं।
बताया गया कि इस दौरान अभिजीत दिपके ने देरी के लिए माफी भी मांगी। इसके बाद घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल पोस्ट में दावा किया गया कि बालाघाट के पत्रकारों ने अभिजीत दिपके को वहां से भगा दिया।
लेकिन इसी दावे को लेकर अब सवाल खड़े हो रहे हैं। दावा है कि वायरल वीडियो में बालाघाट का कोई स्थानीय पत्रकार नजर नहीं आ रहा है बल्कि घटनास्थल पर मौजूद लोग बाहर से आए सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्ति बताए जा रहे हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि जब घटनास्थल पर स्थानीय पत्रकार मौजूद ही नहीं थे तो बालाघाट के पत्रकारों को इस पूरे घटनाक्रम से क्यों जोड़ा गया? क्या वायरल वीडियो के जरिए स्थानीय पत्रकारिता की छवि खराब करने की कोशिश की जा रही है? और सबसे बड़ा सवाल—इन बाहरी सोशल मीडिया इंफ्लुएंसरों को संरक्षण और समर्थन कौन दे रहा है?
