नयी दिल्ली, 11 सितंबर (वार्ता) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा है कि भारत के समुद्रतटीय क्षेत्र को पारिस्थितिकी, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और मानव विकास के एकीकृत क्षेत्र के रूप में देखा जाना चाहिए।
डॉ सिंह ने शुक्रवार को तटीय पारिस्थितिकी, सुरक्षा और स्थिरता पर राष्ट्रीय सम्मेलन को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि भारत की 11,000 से 12,000 किलोमीटर लंबी तटरेखा समुद्री संसाधनों और ‘नीली अर्थव्यवस्था’ के लिए महत्वपूर्ण संभावना रखती है।
उन्होंने कहा कि तटीय पारिस्थितिकी और सुरक्षा को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता तथा इसके लिए समग्र तटीय भारत के दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि महासागर अवलोकन, निगरानी, संचार, रिमोट सेंसिंग और उभरती प्रौद्योगिकियां तटीय सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
डॉ सिंह ने डीप ओशन मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत गहरे समुद्र के बड़े पैमाने पर अज्ञात संसाधनों की खोज के साथ स्वदेशी क्षमताओं का निर्माण कर रहा है। उन्होंने कहा कि हाल में स्वदेशी अनुसंधान पोत ‘ओआरवी सागर मंथन’ का शुभारंभ इस दिशा में आत्मनिर्भरता के प्रयासों को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि गहरे समुद्र में अन्वेषण के लिए रोबोट और सबमर्सिबल विकसित किए जा रहे हैं तथा धातु, खनिज और मत्स्य पालन सहित समुद्री संसाधनों में आर्थिक संभावनाएं हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि तटीय संसाधनों के विकास के साथ तटीय समुदायों की आजीविका और पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा।
उन्होंने कहा कि तटीय बुनियादी ढांचे और बंदरगाह देश के व्यापार तथा आर्थिक विकास के केंद्र में हैं और इनके सतत विकास के लिए समुद्री पर्यावरण की वैज्ञानिक समझ आवश्यक है। उन्होंने ‘स्वच्छ सागर सुरक्षित सागर’ अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि इस वर्ष यह अभियान 12 से 19 सितंबर तक चलेगा, जिसमें सफाई अभियान तथा गैर सरकारी संगठनों और अन्य संगठनों की भागीदारी सहित विभिन्न गतिविधियां होंगी।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत को ऐसा समग्र तटीय दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए, जिसमें पर्यावरणीय स्थिरता, आर्थिक अवसर, वैज्ञानिक क्षमता और तटीय सुरक्षा एक-दूसरे को मजबूत करें।
