
ग्वालियर। जनशक्ति वेलफेयर सोसायटी के संस्थापक अध्यक्ष अरुणेश सिंह भदौरिया ने नागरिकों से अपील की है कि आने वाले चुनाव में जाति और पार्टी के नाम पर वोट देने के बजाय प्रत्याशी के चरित्र, ईमानदारी, योग्यता और उसके पिछले कार्यों को देखकर मतदान करें। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब मतदाता किसी दल या जाति का स्थायी वोट बैंक बनने के बजाय अपने विवेक से सही जनप्रतिनिधि चुनेगा। भदौरिया ने कहा कि देश सडक़, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष सहित अनेक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ा है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में गरीब और आम परिवार आज भी आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। प्रत्येक नागरिक को कभी अपने परिवार के साथ और कभी अकेले बैठकर यह जरूर सोचना चाहिए कि जब देश लगातार प्रगति कर रहा है, तो उसके परिवार की आर्थिक स्थिति उसी गति से क्यों नहीं बदल रही?
उन्होंने कहा कि जनता को यह सवाल भी पूछना चाहिए कि राजनीति में आने से पहले साधारण आर्थिक स्थिति में रहने वाले कुछ जनप्रतिनिधियों की संपत्ति राजनीति में आने के बाद इतनी तेजी से कैसे बढ़ गई। लोकतंत्र में जनता को अपने प्रतिनिधियों से उनके काम और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता का हिसाब मांगने का पूरा अधिकार है। भदौरिया ने कहा कि गरीब को गरीबी से बाहर निकालने के बजाय उसे जातियों में बाँटकर वोट बैंक बनाने की राजनीति पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों को अवसर दिलाने के लिए संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत किया, लेकिन जाति और आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों का इस्तेमाल केवल चुनावी लाभ के लिए नहीं होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दशकों की राजनीति के बाद भी गरीब को बार-बार अपनी जाति के आधार पर वोट देने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो उसकी गरीबी दूर करने, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने, युवाओं को रोजगार दिलाने और परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?
