ग्वालियर: बालाघाट जिले में बैगा आदिवासी समुदाय के 30 बच्चों की मृत्यु से जुड़ी खबर अत्यंत चिंताजनक और पीड़ादायक है। यह केवल एक स्वास्थ्य संबंधी घटना नहीं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण, मलेरिया, गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर स्थिति का संकेत है। यह बात गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कही।
निमराजे ने कहा कि 18 राज्यों के आदिवासी जनप्रतिनिधियों ने इस मामले को लेकर प्रदर्शन किया है तथा बैगा आदिवासी बच्चों की मौत का मुद्दा उठाया है। यदि एक ही क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मृत्यु बीमारी और कुपोषण से होती है, तो इसे सामान्य घटना मानकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। हर बच्चे की मृत्यु के पीछे एक परिवार का भविष्य टूटता है और शासन की स्वास्थ्य व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न खड़ा होता है। उन्होंने कहा कि बैगा समुदाय जैसे विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों के लिए केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है। योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति और अंतिम गांव तक पहुंचना चाहिए। कुपोषण की पहचान, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, मलेरिया की रोकथाम, स्वच्छ पेयजल, पोषण आहार तथा समय पर उपचार की व्यवस्था को ग्राम स्तर पर मजबूत किया जाना आवश्यक है।
जवाबदेही के साथ हो स्वतंत्र जांच
निमराजे ने मांग की कि इस पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि बच्चों की मृत्यु के वास्तविक कारण क्या थे, उन्हें समय पर चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिल सकी तथा संबंधित स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक तंत्र ने क्या कार्रवाई की थी।
उन्होंने कहा कि जांच का उद्देश्य केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी मौतों को रोकने के लिए स्थायी स्वास्थ्य एवं पोषण मॉडल तैयार करना होना चाहिए। प्रभावित गांवों में विशेष स्वास्थ्य शिविर, पोषण सर्वेक्षण, मलेरिया जांच, बच्चों की स्वास्थ्य स्क्रीनिंग तथा गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की निरंतर निगरानी तत्काल शुरू की जानी चाहिए।
