अमरावती, देश के सरकारी और निजी अस्पतालों के नवजात वार्ड (NICU/SNCU) बच्चों की जीवन रक्षा के बजाय लापरवाही और चरमराती व्यवस्था के कारण जानलेवा साबित हो रहे हैं। अमरावती जिला महिला अस्पताल में हाल ही में हुए अग्निकांड ने 3 मासूमों की जान ले ली, जिसने दिल्ली, भोपाल, झांसी और भंडारा में हुए पुराने हादसों की दर्दनाक यादों को ताजा कर दिया है। पिछले छह वर्षों के दौरान देश के विभिन्न अस्पतालों में हुए इन भीषण अग्निकांडों में अब तक कुल 41 नवजात शिशुओं की जान जा चुकी है।
कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता
हर बड़े हादसे के तुरंत बाद प्रशासनिक अमला हरकत में आता है, उच्च स्तरीय जांच समितियों का गठन किया जाता है और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर मामले को शांत कर दिया जाता है। हालांकि सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि दर्जनों मासूमों की जान जाने के बावजूद आज तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी को न्याय प्रणाली से अंतिम सजा नहीं मिल सकी है। वर्षों तक अदालती प्रक्रिया में मामले फंसे रहते हैं और निलंबन झेल चुके अफसर बहाल होकर वापस व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं।
सख्त सुरक्षा ऑडिट और कार्रवाई की मांग
अमरावती की घटना के बाद राजनीतिक गलियारों और विभिन्न मंचों पर भी सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। नेताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कर्मचारियों को निलंबित करने या खानापूर्ति करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अस्पतालों का अनिवार्य रूप से सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए। लापरवाह ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सीधे आपराधिक मामले दर्ज किए जाने की मांग जोर पकड़ रही है, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।

