
ग्वालियर। देश की आजादी का इतिहास केवल गिने-चुने नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी नींव में लाखों ऐसे गुमनाम नायकों का खून और पसीना शामिल है, जिनके नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) के दौरान मध्य प्रदेश का ग्वालियर शहर ऐसे ही अद्वितीय शौर्य, स्वाभिमान और सर्वोच्च बलिदानों का साक्षी बना।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की अंतिम सांसों से लेकर साधुओं के विशाल दल की शहादत और खजांची अमरचंद बांठिया के निष्ठापूर्ण समर्पण तक, ग्वालियर की धरा आज भी देशप्रेम की इन अमर गाथाओं को समेटे हुए है।
”नींव के पत्थर कभी ऊंचे भवन नहीं देख पाते”
जब रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा लेते हुए ग्वालियर पहुंचीं, तब वे सम्राट अकबर के गुरु और प्रख्यात संत बाबा गंगा दास की कुटिया में पहुंची थीं। इतिहास के पन्नों में दर्ज इस मुलाकात के दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने एक भावुक प्रश्न पूछा— “क्या मैं अपनी झांसी को अपनी आंखों से फिर से आजाद देख पाऊंगी?”
इस पर संत बाबा गंगा दास ने अत्यंत गंभीर और दूरदर्शी उत्तर दिया, “ऊंचे भवनों और इमारतों को उनकी नींव में गड़े पत्थर कभी नहीं देख पाते।” उनका यह कथन इस बात का प्रतीक था कि आजादी की इमारत जिन बलिदानों पर खड़ी होगी, उन बलिदानियों को शायद स्वतंत्र भारत देखने का अवसर न मिले, लेकिन उनका त्याग ही आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता की जमीन तैयार करेगा।
746 साधुओं की शहादत का साक्षी: लक्ष्मी बाई कॉलोनी स्थित ‘बड़ी साल’
रानी लक्ष्मीबाई का साथ देते हुए बाबा गंगा दास की कुटिया के 1,200 साधुओं में से 746 साधुओं ने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। यह ऐतिहासिक स्थल आज ग्वालियर की ‘लक्ष्मीबाई कॉलोनी’ में ‘बड़ी साल’ के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में बाबा गंगा दास की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए महंत रामसेवक दास महाराज यहां नियमित रूप से सांस्कृतिक एवं संगीतमय कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इसके साथ ही, विजयादशमी (दशहरा) के पावन अवसर पर यहां उन ऐतिहासिक शस्त्रों का पूजन किया जाता है, जिनका उपयोग 1857 के उस भीषण युद्ध में किया गया था। यह स्थल ग्वालियर के युवाओं को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने वाला एक जीवंत केंद्र है।
सेठ अमरचंद बांठिया: क्रांतिकारियों के लिए खोल दिया ‘गंगाजली’ खजाना
ग्वालियर की इस पावन भूमि पर केवल शस्त्रों से ही नहीं, बल्कि सर्वस्व न्योछावर करके भी क्रांति का अलख जगाया गया। ग्वालियर रियासत के खजांची सेठ अमरचंद बांठिया ने देशभक्ति की एक ऐसी मिसाल कायम की जो विरले ही देखने को मिलती है।
1857 के संग्राम के दौरान, जब रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की सेना को संसाधनों, रसद और सैनिकों के वेतन की सख्त जरूरत थी, तब अमरचंद बांठिया ने बिना किसी हिचकिचाहट के सिंधिया राजघराने का ‘गंगाजली’ खजाना क्रांतिकारियों के लिए खोल दिया। उन्होंने अपना पूरा राजकोष देश की आजादी की लड़ाई में समर्पित कर दिया।
अंग्रेजों ने बाद में महाराज बाड़ा के पास सराफा बाजार के एक विशाल वृक्ष पर सेठ अमरचंद बांठिया को फांसी दे दी। आज भी वह स्थान और विशाल वृक्ष देश की स्वतंत्रता के लिए दिए गए उनके ऐतिहासिक बलिदान की याद दिलाता है।
ग्वालियर के ये ऐतिहासिक स्थल—चाहे ‘बड़ी साल’ हो या सराफा बाजार का वह अमर वृक्ष—आज की युवा पीढ़ी को यह अहसास कराते हैं कि आजादी का यह महल उन ‘नींव के पत्थरों’ पर टिका है, जिनकी कुर्बानी के बल पर आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं।
