आजादी पर्व केबाद से बागली में अष्टधातु से निर्मित भगवान भोलेनाथ निकलते हैं प्रजा का हाल जानने

बागली। बागली नगर में प्रत्येक वर्ष के सावन के महीने में प्रति सोमवार भगवान भोलेनाथ प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए निकलते हैं। पुरानी परंपरा अनुसार पूर्व दिवंगत प्रकांड पंडित अंबुजी महाराज द्वारा विधि विधानसे बनवाई गई अष्टधातु से निर्मित भगवान भोलेनाथ के मुखौटे का श्रृंगार करके सवारी के रूप में निकाला जाता है । भगवान शंकर जी के प्रतीक इस मुखोटे को डोली के रूप में सजाकर शंखनाद एवं ढोल धमाके के साथ नगर के प्रमुख मार्ग से निकाला जाता है ।यह परंपरा आजादी पर्व के साथ ही आरंभ हो गई थी। राज परिवार द्वारा स्थापित तालाब की पाल पर यह शंकर मंदिर लगभग 80 वर्ष पुराना है।

इसके पूर्व बीच बाजार में वर्तमान जैन मंदिर में ही भगवान शंकर विराजित रहे साधु संतों की अत्यधिक आवाहाजाही के चलते उनकी ध्यान मुद्रा को ध्यान में रखते हुए इस मंदिर को शंकर मंदिर तालाब की पाल पर परिवर्तित किया संभवत तालाब भी भीषण सूखे में अकाल जैसी स्थिति को देखते हुए राज परिवार द्वारा श्रमदान के बदले अनाज वाली योजना के तहत बनवाया वर्तमान पुजारी भगवान गिरी महाराज एवं उनके पुत्र महेश गिरी गोस्वामी ने बताया कि उनके परिवार की चौथी पीढ़ी यहां पूजा अर्चना कर रही है। मंदिर के अन्य पुजारी मुकेश गिरी महाराज रमेश गिरी महाराज महेंद्र गिरी महाराज आदि ने बताया कि सोमवार को सवारी निकलने की परंपरा बहुत पुरानी है। हालांकि आखिरी सोमवार को झांकी निकालने की परंपरा 1982 मे लंगर बीड़ी उत्पादक ठाकुर साउ देकर एंड कंपनी द्वारा शुरू की गई थी। जो वर्तमान में विस्तार होकर नगर परिषद विपिन तिवारी मित्र मंडल एवं अन्य सामाजिक श्रद्धालुओं के सौजन्य से चालू है। आरंभ के दिनों में खातेगांव से ही ट्रैक्टर की ट्राली पर झांकी बनवाकर लाई गई थी। सवारी निकलने के दौरान चंपा बाग व्यायाम शाला के युवा राज परिवार गड़ी के सामने गांधी चौक इनानी चौराहा इमलीचौराहा अंबे माता चौराहा आदि स्थान पर आज भी डांडिया खेलते हैं। मंदिर से निकलने के बाद सवारी सीधे काली सिंध नदी पर पहुंचती है ‌वहां अभिषेक होने के बाद राज परिवार के सदस्य प्रतिमा का पूजन करते हैं फिर यह सिलसिला पूरे नगर भर में चलता रहता है। पंडित चंद्रप्रकाश जोशी ने बताया कि भगवान भोलेनाथ ही ऐसे दयालु भगवान है जिन्हें मौसम की वास्तु जैसे ककड़ी डोचरा मुमफली आदि सामग्री फल के रूप में अर्पित की जाती है। आज भी बागली नगर में सावन सोमवार का उपवास करने वाली महिलाएं जब तक सवारी के दर्शन नहीं कर लेती तब तक भोजन नहीं करती है यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

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