नयी दिल्ली, 05 अगस्त (वार्ता) छात्र आंदोलनों और प्रदर्शनों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों से निपटते समय संयम बरतना चाहिए।
न्यायालय ने टकराव की जगह परामर्श और बातचीत का रास्ता अपनाने की वकालत करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही कुछ भटके हुए तत्व हिंसा में शामिल हों, लेकिन प्राथमिक प्रयास युवा प्रदर्शनकारियों को समझाने-बुझाने का होना चाहिए। राज्य की सख्त या आक्रामक कार्रवाई से स्थिति बिगड़ सकती है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ 20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च के आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। शीर्ष अदालत ने सेवानिवृत्त वायु सेना अधिकारी मनीष कुमार सोलंकी की दायर इस याचिका को छात्र विरोध प्रदर्शनों से संबंधित लंबित मामलों के समूह के साथ टैग कर दिया।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा, “प्रदर्शनकारी युवा छात्र हैं। उन्हें परामर्श और इस आश्वासन की आवश्यकता है कि उनकी बात सुनी जा रही है। राज्य का आक्रामक रुख सामाजिक रूप से स्थिति को बिगाड़ सकता है और हिंसा को और भड़का सकता है। इससे बचा जाना चाहिए।”
पीठ ने जोर देकर कहा कि पुलिस को धैर्यपूर्वक यह समझना चाहिए कि युवा विरोध क्यों कर रहे हैं, हालांकि जमीनी हालात का आकलन करने और स्थिति से निपटने का अंतिम तरीका कानून लागू करने वाली एजेंसियों के विवेक पर ही छोड़ा जाना चाहिए।
दूसरी ओर, सेवानिवृत्त वायु सेना अधिकारी मनीष कुमार सोलंकी की ओर से पेश अधिवक्ता रिजवान अहमद ने प्रदर्शन के आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी आयोजक उकसाने वाले बयान दे रहे हैं। अधिवक्ता ने चेतावनी दी कि राजनीतिक समझौतों के आधार पर जेन-जी छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों और प्राथमिकियों को वापस लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि यह भविष्य के आंदोलनों के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा।
याचिकाकर्ता ने राजस्थान की हालिया घटना का हवाला देते हुए कहा कि पथराव और हिंसा में शामिल आरोपियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए, हालांकि उन्होंने अभद्र नारेबाजी में शामिल नाबालिगों के लिए निगरानी में सामुदायिक सेवा का सुझाव दिया।
गौरतलब है कि तीन अगस्त को शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
