
जबलपुर। सौ करोड़ से अधिक मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ्तार किये गये आरटीओ विभाग के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा को हाईकोर्ट से जमानत का लाभ मिल गया है। हाईकोर्ट जस्टिस अजय कुमार निरंकारी ने अपने आदेश में कहा है कि प्रवर्तन निदेशालय जांच पूरी कर न्यायालय के समक्ष चालान प्रस्तुत कर चुका है। न्यायालय ने आरोप भी तय कर दिये है। विचाराधीन कैदी विगत 16 माह से न्यायिक हिरासत में है और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनवाई पूरी करने में समय लगने की संभावना है। एकलपीठ ने इस आधार पर आरोपी को जमानत का लाभ प्रदान कर दिया।
याचिकाकर्ता सौरभ शर्मा की तरफ से जमानत के लिए हाईकोर्ट में स्थाई जमानत के लिए आवेदन किया गया था। पूर्व में हाईकोर्ट ने दो बार स्थाई जमानत आवेदन को निरस्त कर दिया था। बीमार पत्नी के ऑपरेशन के लिए दायर किये गये अस्थाई जमानत आवेदन को भी निरस्त कर दिया गया था। जमानत आवेदन में कहा गया था कि वह मध्य प्रदेश राज्य के परिवहन विभाग में आरक्षक के पद पर पदस्थ था और स्वेच्छा से सेवानिवृत्त गया था। उस पर आरोप है कि उसने परिवार के सदस्यों, सहयोगियों और अन्य संबंधित संस्थाओं के नाम पर कुछ चल और अचल संपत्तियाँ, निवेश और वित्तीय लेनदेन किये है। सार्वजनिक सेवा में अपने कार्यकाल के दौरान ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की थी। लोकायुक्त द्वारा 19 दिसंबर 2024 को दी गयी दबिश के दौरान आवेदक के विभिन्न परिसरों से नकद, सोने के आभूषण और अन्य कीमती सामान बरामद किए गए थे। इसके अलावा उसी तारीख को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सह-आरोपी चेतन सिंह गौर के नाम पर रजिस्टर्ड एक गाड़ी से कैश और सोने की ईंटें बरामद कीं थी। जिसका इस्तेमाल मौजूदा आवेदक कर रहा था।
इसी आधार पर प्रवर्तन निदेशालय भोपाल के द्वारा उसके खिलाफ 21 दिसम्बर 2024 को प्रकरण दर्ज किया गया था। लोकायुक्त द्वारा दर्ज किये गये प्रकरण में आवेदक न्यायिक हिरासत में था। न्यायिक हिरासत के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने 10 फरवरी 2025 औपचारिक रूप से उसे गिरफ्तार किया था। लोकायुक्त द्वारा दर्ज प्रकरण में निर्धारित समय सीमा में चालान प्रस्तुत नहीं किये जाने के कारण उसे जमानत का लाभ मिल गया था।
जमानत आवेदन में कहा गया था कि प्रवर्तन निदेशालय की जांच पूरी हो गयी है और उनकी तरफ से न्यायालय में चालान भी प्रस्तुत कर दिया गया है। न्यायालय के द्वारा आरोप भी तय कर दिये गये है। अभियोजन का मामला लगभग पूरी तरह से दस्तावेजी सबूतों पर आधारित है। अभियोजन की तरफ से लगभग तीन हजार पन्ने दस्तावेजों पेश किये गये है। गवाहों व आरोपियों की संख्या को देखते हुए, मुकदमे के नतीजे तक पहुँचने में समय लग सकता है। वह विगत 16 माह से न्यायिक अभिरक्षा में है और अपराध में अधिकतम सजा सात साल है।
जमानत आवेदन का विरोध करते हुए प्रवर्तन निदेशालय की तरफ से कहा गया कि मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम 2002 के तहत अपराध अधिनियम की धारा 45 में दिए गए विशेष प्रावधानों द्वारा नियंत्रित होते हैं। यह अच्छी तरह से स्थापित है कि इस तरह के दंडनीय अपराधों के संबंध में जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय, अदालत को जमानत देने के सामान्य सिद्धांतों के अलावा धारा 45 में शामिल वैधानिक प्रतिबंधों को भी लागू करना होता है। आर्थिक अपराधों की एक अलग श्रेणी हैं और उन्हें गंभीरता से देखा जाना चाहिए। खासकर तब जब उनमें गहरी साजिशें, सार्वजनिक धन का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग शामिल हो या देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ता हो।
आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाता है, तो इस बात का उचित डर है कि वह गवाहों को प्रभावित तथा सबूतों के साथ छेड़छाड़ या कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिश कर सकता है। आरोपी अपराध से मिली कमाई से हासिल की गई संपत्तियों को छिपाने, ट्रांसफर करने, किसी और को देने या ठिकाने लगाने की कोशिश कर सकता है।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि कथित अपराध के लिए अधिकतम सजा सात साल है और सुनवाई के निकट भविष्य में खत्म होने की संभावना नहीं है। आवेदक विगत 16 माह से न्यायिक अभिरक्षा में है। वर्तमान परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए आवेदक को जमानत का लाभ प्रदान किया जाता है। ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार दस लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की एक सॉल्वेंट स्थानीय जमानत जमा करे। एकलपीठ ने आवेदक को सशर्त जमानत का लाभ प्रदान किया।
