
दमोह। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में रविवार प्रातःकालीन मंगल बेला में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने अत्यंत शांत, निर्विकार और तपमय वातावरण में केशलोंच की पवित्र साधना संपन्न की। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और उन्होंने मुनिश्री के कठोर संयम, वैराग्य तथा आत्मसाधना के इस अनुपम स्वरूप के दर्शन कर धर्मलाभ प्राप्त किया।जैन परंपरा में केशलोंच केवल बालों का त्याग नहीं, बल्कि देहाभिमान, मोह और ममता के परित्याग का प्रतीक माना जाता है। यह साधना तप, सहनशीलता, आत्मबल और वैराग्य की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। मुनिराज बिना किसी उपकरण के अपने हाथों से केशों का त्याग कर यह संदेश देते हैं कि आत्मकल्याण का मार्ग त्याग, संयम और तपस्या से होकर ही जाता है। जिस दिन जैन साधू केशलोंच करते है उस दिवस उनका उपवास रहता है… यानि 48 घंटे बाद सोमवार को आहार पानी ग्रहण करेंगे।
