
दमोह। श्रावण मास के पवित्र अवसर पर जबलपुर नाका वन विश्राम स्थित श्री देव नंदीश्वर महादेव नंदीवन मंदिर परिसर में रुद्री निर्माण व रुद्राभिषेक का आयोजन चल रहा है। इस अवसर पर श्रद्धालुओं को शास्त्रसम्मत पूजा-पद्धति का पालन करने का संदेश देते हुए आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज ने कहा कि पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करते समय उसमें नेत्र, नासिका, कान, मुख अथवा मानवाकृति बनाना शास्त्रसम्मत नहीं है। शिवलिंग स्वयं भगवान सदाशिव के निराकार, अनादि, अनन्त व अखण्ड ब्रह्मस्वरूप का प्रतीक है अतः उसे मनुष्य के शरीर के समान आकृति प्रदान करना शास्त्रों की भावना के अनुरूप नहीं माना गया है शिवपुराण तथा लिंगपुराण में शिवलिंग को भगवान शिव का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है लिङ्ग शब्द का अर्थ केवल एक आकार नहीं, बल्कि वह चिह्न है जिसके माध्यम से समस्त सृष्टि के मूल कारण परमब्रह्म का बोध होता है शिवलिंग इस सत्य का प्रतीक है कि भगवान शिव किसी सीमित देह या रूप में बंधे नहीं हैं, बल्कि वे समस्त चराचर जगत में व्याप्त, निराकार, निर्गुण एवं अनन्त सत्ता हैं इसलिए शिवलिंग पर मानव शरीर के अंगों का अंकन करना उसकी आध्यात्मिक अवधारणा को सीमित कर देता है जिस प्रकार भगवान विष्णु का शालिग्राम शिला-स्वरूप में पूजित होता है और उसमें नेत्र, मुख या अन्य अंग नहीं बनाए जाते, उसी प्रकार भगवान शिव का शिवलिंग भी निराकार उपासना का सर्वोच्च प्रतीक है शालिग्राम और शिवलिंग दोनों ही सनातन परम्परा में परमात्मा के निराकार स्वरूप के प्रतीक माने गए हैं। इसलिए इन पर मानवीय आकृतियाँ बनाना शास्त्रीय परम्परा का अंग नहीं है लिंगपुराण में शिवलिंग को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार कहा गया है। यह सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार का प्रतीक है शिवलिंग का ऊर्ध्वभाग अनन्त चेतना तथा अधिष्ठान भाग शक्ति का द्योतक माना गया है यह सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त शिव-शक्ति के अद्वैत स्वरूप का प्रतीक है इस दिव्य प्रतीक में नेत्र, नाक, कान अथवा मुख बनाकर उसे मानवीय रूप देना शास्त्रों में कहीं भी अनिवार्य या प्रशंसित नहीं बताया गया है उन्होंने कहा कि शिवपुराण में आया है कि पार्थिव शिवलिंग का श्रद्धा एवं विधिपूर्वक पूजन करने से भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न होते हैं किन्तु शास्त्रों में कहीं भी यह निर्देश नहीं मिलता कि पार्थिव शिवलिंग पर नेत्र, नासिका या मुख बनाना आवश्यक है अतः श्रद्धालुओं को अपनी कल्पना के स्थान पर शास्त्रीय मर्यादा का पालन करना चाहिए वर्तमान समय में सोशल मीडिया तथा दिखावे की प्रवृत्ति के कारण अनेक स्थानों पर मिट्टी के शिवलिंगों पर आंख, कान, नाक, मूंछ अथवा विभिन्न प्रकार की सजावट कर उन्हें मानवाकृति प्रदान की जा रही है यह भाव भले ही श्रद्धा से प्रेरित हो, किन्तु शास्त्रीय दृष्टि से इसे उचित नहीं कहा जा सकता सनातन धर्म में श्रद्धा के साथ-साथ शास्त्र का भी समान महत्व है केवल भावना ही पर्याप्त नहीं होती, भावना का शास्त्रसम्मत होना भी आवश्यक है उन्होंने कहा कि भगवान शिव स्वयं निराकार, निष्कल तथा सकल-निष्कल दोनों स्वरूपों में पूजित हैं। मूर्तिरूप में उनकी प्रतिमा का पूजन अलग विधान है, जबकि शिवलिंग का पूजन निराकार ब्रह्मस्वरूप की उपासना का विधान है अतः दोनों स्वरूपों की मर्यादा और पूजा-पद्धति को मिश्रित नहीं करना चाहिए यदि शिव की मूर्ति स्थापित की जाए तो उसमें मुखमण्डल एवं अंगों का होना स्वाभाविक है, किन्तु शिवलिंग का स्वरूप शास्त्रों में अलग और विशिष्ट माना गया है
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि पार्थिव शिवलिंग निर्माण के समय शिवलिंग को समुचित अनुपात में, शास्त्रसम्मत एवं सरल रूप में तैयार करें उसके पश्चात वैदिक मंत्रों से पूजन करें यही पूजा भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय मानी गई है शिव की प्रसन्नता बाहरी अलंकरण से नहीं, बल्कि श्रद्धा, पवित्रता, संयम, भक्ति और शास्त्रसम्मत आचरण से प्राप्त होती है श्रावण मास, रुद्राभिषेक और पार्थिव शिवलिंग निर्माण का वास्तविक उद्देश्य भगवान शिव के निराकार, सर्वव्यापक और कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान करना है। इसलिए सभी श्रद्धालुओं पुजारियों तथा आयोजन समितियों को चाहिए कि वे शिवपुराण लिंगपुराण तथा आगम-शास्त्रों में वर्णित मर्यादाओं का पालन करते हुए पूजा-अर्चना करें और समाज को भी शास्त्रसम्मत उपासना के लिए प्रेरित करें यही सनातन परम्परा की रक्षा तथा भगवान भोलेनाथ के प्रति सच्ची श्रद्धा का परिचायक है
