मोह का त्याग ही आत्मा की निर्मलता और सम्यक दर्शन का मार्ग: आचार्य समय सागर

भोपाल। श्री विद्योदय तीर्थ, एमपी नगर में आयोजित रत्नकरण्ड श्रावकाचार की वाचना में परम पूज्य आचार्य श्री 108 समय सागर महाराज ने कहा कि आत्मा की निर्मलता का मार्ग मोह के त्याग से होकर जाता है तथा मोहनीय कर्मों के क्षय से ही केवलज्ञान की प्राप्ति संभव होती है। उन्होंने कहा कि केवलज्ञानी भगवान बिना इंद्रियों के समस्त लोक और त्रिकाल का प्रत्यक्ष ज्ञान रखते हैं, फिर भी वीतराग भाव में स्थित रहते हैं। आचार्य श्री ने बताया कि वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में जानना ही सम्यक दर्शन है और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना सच्चा धर्म है। उन्होंने गुरुदेव की साधना का स्मरण कर संयम, कर्मबंध से बचने और अपनी क्षमता के अनुरूप साधना करने की प्रेरणा दी। प्रवचन के अंत में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं, मुनिराजों और ब्रह्मचारियों ने धर्मलाभ प्राप्त कर आत्मकल्याण का संकल्प लिया।

 

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