जन दबाव के आगे झुकी सरकार, प्रधान ने दिया इस्तीफा 

प्रवेश कुमार मिश्र नई दिल्ली। नीट पेपर लीक विवाद, देशव्यापी छात्र आंदोलन के प्रचंड दबाव व विपक्षी दलों के आक्रामक तेवरों के कारण सरकार के इकबाल पर उठते सवालों के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा अपने पीछे कई जीवंत सवालों को छोड गया जो ऐतिहासिक तथ्यों के साथ सत्ता के शीर्ष को झकझोरता रहेगा.

केंद्र में पिछले 12 वर्षों के राजग शासनकाल में यह पहला मौका है जब सरकार को किसी बड़े जन-आंदोलन और चौतरफा राजनीतिक दबाव के सामने घुटने टेकने पड़े हैं और किसी कैबिनेट मंत्री को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है. राजनाथ सिंह का कभी का वह मशहूर बयान जो राजनीतिक गलियारों में सुना ,जिसमें उन्होंने वर्षों पहले कहा था कि ‘राजग सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते’ आखिरकार वक्त के चक्र और युवा आक्रोश के थपेड़ों से टूट गया है. यह इस्तीफा केवल एक मंत्री का जाना नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को अनंत काल तक अनसुना नहीं किया जा सकता.

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में देश के करोड़ों छात्रों और युवाओं का वह स्वतःस्फूर्त और संगठित आक्रोश है, जो परीक्षा प्रणालियों के कथित तौर पर ध्वस्त होने से उपजा है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी और विभिन्न छात्र संगठनों का एक महीने से अधिक समय से जारी धरना, सोनम वांगचुक का 26 दिनों का कड़ा अनशन और देश के कोने-कोने में सड़कों पर उतरे छात्रों के गुस्से ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया.

इतना ही नहीं जानकार बता रहे हैं कि इस छात्र आंदोलन को धार देने और इसे संसद से सड़क तक एक बड़ी राजनीतिक चुनौती में बदलने का काम विपक्ष, विशेषकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आक्रामक तेवरों ने किया. राहुल गांधी ने जिस तरह सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कटघरे में खड़ा किया, लाठीचार्ज और पैलेट गन से घायल छात्रों के साथ मीडिया से रूबरू होकर सीधे सरकार की साख पर प्रहार किया, उसने विपक्ष की नई और मजबूत स्थिति को रेखांकित किया. संसद में चर्चा को रोकने की चेतावनी और धर्मेंद्र प्रधान की बर्खास्तगी से कम कुछ भी मंजूर नहीं का उनका अड़ियल और स्पष्ट रुख रंग लाया. विपक्ष ने इस मुद्दे को सीधे मोदी के गिरते विश्वास और सरकार की गिरती साख के नैरेटिव से जोड़ दिया, जिससे सरकार के लिए इस संकट को टालना असंभव हो गया.

जानकार बता रहे हैं कि वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी का यह बयान कि देर आए, दुरुस्त आए इस बात की तस्दीक करता है कि सरकार के भीतर भी इस अव्यवस्था को लेकर गहरी बेचैनी थी. इतना ही नहीं इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत और सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी इसका विकेंद्रीकरण था. जब तक यह आंदोलन दिल्ली तक सीमित था, तब तक सरकार इसे ‘चुनिंदा तत्वों का विरोध’ कहकर टालती रही. लेकिन इंटेलिजेंस और सरकार की आंतरिक रिपोर्टों ने इस इस्तीफे को अपरिहार्य बना दिया. अंदरूनी रिपोर्टों में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि यदि देश के छोटे शहरों में फैला यह छात्र आंदोलन और लंबा खिंचा, तो यह 1973 के गुजरात के मोरबी छात्र आंदोलन या 1974 के जेपी आंदोलन जैसा रूप ले सकता है, जिसने तत्कालीन सरकारों को उखाड़ फेंका था. सरकार को भली-भांति समझ आ गया था कि आगामी राज्यों के विधानसभा चुनावों में युवा मतदाताओं की यह नाराजगी प्रधानमंत्री मोदी की साख और उनकी राजनीतिक छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है. आधी रात को प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो संदेश के बाद भी जब विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी जैसे युवा संगठनों का दबाव कम नहीं हुआ, तो सरकार को मजबूरन धर्मेंद्र प्रधान की बलि देनी ही पड़ी.

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