
बालाघाट, शहर के सर्किट हाउस में एक अजूबी मामले की श्रीराम मंदिर ट्रस्ट, अन्नपूर्णा मंदिर ट्रस्ट, अंग्रेजी स्कूल ट्रस्ट तथा अग्रवाल समाज ने संयुक्त रूप पत्रकारों से चर्चा किया ।
प्रेस को जानकारी देते हुए उक्त सभी ट्रस्टों के पदाधिकारियों ने बताया कि जिले में कई दानदाता पैदा हुए जिन्होंने अपना सबकुछ जन कल्याण में दान कर दिया है ।ऐसे की एक दानदाता हुए जिन्होंने अपनी जीवन भर की सारी जमा पूंजी अपने परिवार को ना देकर समाज ,मंदिर और गरीबों के कल्याण हाथ दान कर दिया । लेकिन उनके सपनों को साकार करने के बजाय उनके के कर्णधरो ने चकनाचूर कर दिया ओर दान के बजाय हरफेर कर संपत्ति ही बेच डाली । इस तरह अमानत में खयानत का मामला विश्वास में धोखा का सामने आया ।
प्रेस वार्ता में बताया गया कि दानदाता मोहनलाल माहेश्वरी की वसीयत को छिपा कर कुछ लोगों ने लगभग 60 करोड की उक्त संपत्ति का कुछ हिस्सा छल पूर्वक अन्यत्र लोगों को बेच भी दिया है। वसीयत छिपाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराएंगे। साथ ही उच्च स्तरीय मामले की जांच कराएंगे।
30 वर्षो तक वसीयत छिपाई गयी
ट्रस्ट के लोगों ने स्वर्गीय मोहनलाल माहेश्वरी की 16 अगस्त 1996 की वसीयत से जुडा मुद्दा उठाते हुए दावा किया है कि वसीयत लगभग 30 वर्षों तक सार्वजनिक नहीं की गई। जिससे वसीयतकर्ता की अंतिम इच्छा का पालन नहीं हो सका और इस दौरान मंदिर ट्रस्ट की संपत्तियों के संबंध में कथित रूप से ऐसे निर्णय लिए गए जिनसे कुछ लोगों को अनुचित आर्थिक लाभ मिला।
सूरजमल को मिला था बंद लिफाफा
अधिवक्ता वर्णन श्रीवास्तव ने बताया कि स्वर्गीय मोहनलाल माहेश्वरी ने 16 अगस्त 1996 को वसीयत लिखी थी तथा उसे निष्पादित करने के लिये सुरजमल बोहरा को बंद लिफाफे में सौंपी थी। निर्देश दिये थे कि मेरी मृत्यु के बाद उसे मूल अवस्था में अनिल कांकरिया को सौंप देना। जहां विधिक नोटिसों के जवाब में सूरजमल बोहरा ने स्वीकार किया है कि स्वर्गीय मोहनलाल माहेश्वरी ने उन्हें एक बंद लिफाफा सौंपा था और निर्देश दिया था। वहीं अनिल कांकड़िया ने भी अपने लिखित उत्तर में यह स्वीकार किया है कि उन्हें उक्त वसीयत सुरजमल बोहरा से मोहनलाल माहेश्वरी के निधन के बाद प्राप्त हुई थी।
वसीयत छिपाकर रखा गया
ट्रस्टों का कहना है कि यदि वसीयत वर्ष 1996 से अस्तित्व में थी और वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद संबंधित व्यक्तियों के कब्जे में आ गई थी, तो फिर उसका समय पर क्रियान्वयन क्यों नहीं किया गया। उनका आरोप है कि वसीयत को लंबे समय तक जानबूझकर गुप्त रखा गया और संबंधित हितधारकों को इसकी जानकारी नहीं दी गई। ट्रस्टों का यह भी आरोप है कि इस अवधि में मंदिर ट्रस्ट की मूल्यवान संपत्तियों का विक्रयए अंतरण और अन्य वित्तीय लेन.देन किए गए। जिनसे कथित रूप से कुछ व्यक्तियों को लाभ पहुंचा।
60 करोड़ की संपत्ति का कुछ हिस्सा बेच दी
ट्रस्ट पदाधिकारियों ने दावा किया है कि लगभग 60 करोड की उक्त संपत्ति का कुछ हिस्सा संबधितों के वारसानों के द्वारा मिलीभगत करछल पूर्वक अन्यत्र लोगों को बेच भी दिया है। ट्रस्ट ने मांग की है कि इस मामले में उच्च स्तरीय जांच हो। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल वसीयतकर्ता की अंतिम इच्छा की अवहेलना नहीं बल्कि धार्मिक न्यास की संपत्तियों के साथ गंभीर विश्वासघात और समाज के साथ छल का मामला भी हो सकता है। ट्रस्टों ने दावा किया है कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर भारतीय न्याय संहिताकी विभिन्न धाराओं जैसे आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र, बेईमानी से संपत्ति के दुरुपयोग तथा जालसाजी से संबंधित प्रावधानों के तहत जांच की आवश्यकता बनती है। साथ ही यदि संपत्तियों के विक्रय से प्राप्त राशि के अवैध उपयोग या धनशोधन के प्रमाण मिलते हैं तो धनशोधन निवारण अधिनियम केj तहत भी कार्रवाई की मांग की जाएगी।
एफआईआर दर्ज कराएंगे
अब ट्रस्ट ने इस मामले में सुरजमल बोहरा और अनिल कांकरिया दोनों ही लोगों के खिलाफ जल्द ही एफआईआर दर्ज करवाने की बात कही है। ट्रस्ट पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे इस मामले को केवल दीवानी विवाद तक सीमित नहीं रखेंगे।संयुक्त निर्णय के अनुसार शीघ्र ही सक्षम पुलिस अधिकारियों के समक्ष विस्तृत आपराधिक शिकायत प्रस्तुत की जाएगी। इसके अलावा मध्यप्रदेश के आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ से तकनीकी एवं निष्पक्ष जांच की मांग की जाएगी। संपत्तियों के विक्रय, अंतरण, बैंक खातों के वित्तीय लेन.देन तथा उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित कराई जाएगी । उक्त प्रेस वार्ता में श्रीराम मंदिर ट्रस्ट से सूरेश सोनी , प्रमोद तिवारी, श्याम कौशल, अन्नपूर्णा मंदिर ट्रस्ट से विजय वर्मा ,सुशील वर्मा , अग्रवाल समाज से हरिओम अग्रवाल, इंग्लिश स्कूल ट्रस्ट के अध्यक्ष गोपाल अग्रवाल ,पार्श्वेंद्र पारधी एवं अन्य लोग उपस्थित थे ।
इस संबंध में अनिल कांकरिया ने बताया कि वसीयत की रजिस्ट्री श्री सुरजमल से मिलने के बाद उसी समय 1996 को वसीयत को कोर्ट में जमा कर दिया था । माननीय कोर्ट के द्वारा 1997 में संबंधित सभी पक्ष को नोटिस भेजा गया जिसकी तामीली भी हो चुकी है लेकिन किसी के भी द्वारा कोर्ट में पेशी या अपना वकील के द्वारा कोई भी कार्यवाही नहीं की गई ओर अब ये सभी मुझ पर गलत आरोप लगा रहे है । मैं तो इस मामले में पूरी ईमानदारी से कर रहा हु ।
वही इस प्रेस वार्ता में उपस्थित इंग्लिश स्कूल ट्रस्ट के अध्यक्ष गोपाल अग्रवाल ने बताया कि मुझे प्रेस वार्ता में बुलाया गया था लेकिन इसका उद्देश्य क्या है यह नहीं बताया गया । मुझे तो वह जाने पर प्रेस विज्ञति दी गई जिसमें इस मामले में हमारी सहमति दर्शाई गई जिसका हम खंडन करते हैं और इस प्रकार के किसी भी कार्यवाही में हमारी किसी भी प्रकार सहमति नहीं है या सहयोग नहीं रहेगा ।
