(जन्मदिवस 24 जुलाई के अवसर पर)मुंबई, 24 जुलाई (वार्ता) भारतीय सिनेमा जगत में मनोज कुमार का नाम ऐसे फिल्मकार-अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण फिल्मों के जरिये दर्शकों के दिलों पर राज किया। 24 जुलाई 1937 को जन्मे मनोज कुमार ने अपने सशक्त अभिनय और देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों के बल पर भारतीय सिनेमा में एक विशिष्ट स्थान बनाया। अपने फिल्मी सफर में उन्होंने ऐसी कई यादगार फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया, जिन्होंने उन्हें ‘भारत कुमार’ के नाम से अमर कर दिया। मनोज कुमार का मूल नाम हरिकिशन गिरी गोस्वामी था। उनका जन्म तत्कालीन अविभाजित भारत के एबटाबाद (अब पाकिस्तान) में हुआ था। देश के विभाजन के बाद उनका परिवार राजस्थान के हनुमानगढ़ होते हुए दिल्ली में आकर बस गया। बचपन के दिनों में उन्होंने दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म ‘शबनम’ देखी थी। फिल्म में दिलीप कुमार के निभाए किरदार ‘मनोज’ से वह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना नाम मनोज कुमार रख लिया और अभिनेता बनने का सपना संजो लिया।
मनोज कुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वह अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे। बतौर अभिनेता उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘फैशन’ से की, जिसमें उनकी छोटी-सी भूमिका थी। शुरुआती वर्षों में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। वर्ष 1957 से 1962 के बीच उन्होंने ‘कांच की गुड़िया’, ‘रेशमी रूमाल’, ‘सहारा’, ‘पंचायत’, ‘सुहाग सिंदूर’, ‘हनीमून’ और ‘पिया मिलन की आस’ जैसी फिल्मों में काम किया, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर सकी। मनोज कुमार के अभिनय का सितारा वर्ष 1962 में प्रदर्शित निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ से चमका। फिल्म में उनके साथ माला सिन्हा थीं और दोनों की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। इसके बाद वर्ष 1964 में प्रदर्शित रहस्य-रोमांच से भरपूर फिल्म ‘वह कौन थी’ ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ा दिया। इस फिल्म में साधना के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आई।
वर्ष 1965 मनोज कुमार के करियर का बेहद महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ।
इस दौरान उनकी फिल्में ‘गुमनाम’, ‘हिमालय की गोद में’ और ‘शहीद’ प्रदर्शित हुईं। ‘शहीद’ में उन्होंने शहीद-ए-आजम भगत सिंह की भूमिका को बड़े प्रभावशाली ढंग से निभाया। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत इस फिल्म के गीत और संवाद आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया और मनोज कुमार को इस विषय पर फिल्म बनाने की प्रेरणा दी। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1967 में फिल्म ‘उपकार’ बनी। इस फिल्म में मनोज कुमार ने किसान और जवान दोनों की भूमिका निभाई। उनके किरदार ‘भारत’ को इतनी लोकप्रियता मिली कि वह आगे चलकर ‘भारत कुमार’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
वर्ष 1970 में मनोज कुमार के निर्माण और निर्देशन में बनी फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में उन्होंने भारतीय संस्कृति और पश्चिमी जीवन शैली के बीच के अंतर को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। इसके बाद वर्ष 1972 में ‘शोर’ और वर्ष 1974 में ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को बड़े पर्दे पर उठाया। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ को भारतीय समाज की ज्वलंत समस्याओं को चित्रित करने वाली महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है।
वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस नंबरी’ की सफलता के बाद मनोज कुमार ने कुछ समय के लिए फिल्मों से दूरी बना ली। वर्ष 1981 में उन्होंने ‘क्रांति’ के जरिए शानदार वापसी की।
इस फिल्म में उनके साथ उनके आदर्श अभिनेता दिलीप कुमार भी नजर आए। देशभक्ति से ओतप्रोत इस फिल्म को जबरदस्त सफलता मिली और यह उस दौर की सबसे सफल फिल्मों में शामिल हुई। वर्ष 1983 में उन्होंने अपने पुत्र कुणाल गोस्वामी को फिल्म उद्योग में स्थापित करने के उद्देश्य से ‘पेंटर बाबू’ का निर्माण किया, लेकिन फिल्म सफल नहीं हो सकी। इसके बाद वर्ष 1989 में उन्होंने ‘क्लर्क’ का निर्माण और निर्देशन किया, किंतु यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई। वर्ष 1999 में प्रदर्शित ‘जय हिंद’ बतौर निर्माता- निर्देशक उनकी अंतिम फिल्म साबित हुई।
मनोज कुमार को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें सात फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुए। भारत सरकार ने वर्ष 1992 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें वर्ष 2016 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया।चार अप्रैल 2025 को मनोज कुमार का निधन हो गया।

