हाईटेक प्रोजेक्ट पीएचक्यू तक पहुंच फाइलों में हुए दफन

जबलपुर: पुलिस को आधुनिक, हाईटेक और स्मार्ट पुलिस बनाने के दावे सिर्फ कागजी साबित हो रहे हैं। दरअसल पुलिस मुख्यालय में जबलपुर पुलिस रेडियो विभाग के कई अति-महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स सालों से फाइलों में दबे पड़े हैं। तकनीक के इस दौर में भी पुलिस कछुआ गति से चल रही है। जानकारों की माने तो रेडियो विभाग के राजधानी भोपाल और इंदौर में तो फिर भी कुछ काम दिख जाता है, लेकिन जबलपुर को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। आधुनिक, स्मार्ट पुलिसिंग से लेकर कनेक्टिविटी, सुरक्षा से जुडे रेडियो विभाग के कई महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स भोपाल में अटके होने के कारण संस्कारधानी की कानून व्यवस्था और पुलिसिंग प्रभावित हो रही है। ड्रोन से लेकर खुद के सैटेलाइट और मॉडर्न कम्युनिकेशन सिस्टम (ट्रंकिंग सिस्टम) तक के प्रोजेक्ट्स पर सालों से कोई प्रगति नहीं हुई है। प्रोजेक्ट भोपाल में मंजूरी के इंतजार में अटके हुए है।
रेडियो विभाग के ये बड़े प्रोजेक्ट्स
तीसरी आंख पर ग्रहण
महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए एक योजना तैयार की थी। इसके तहत संवेदनशील और हार्ट स्पॉट्स की पहचान कर हाईटेक सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने थे। योजना सिर्फ शहर बल्कि तहसील स्तर के ग्रामीण थानों को भी इस सर्विलांस नेटवर्क से जोडऩा था। सूत्रों की माने तो इंदौर में इसकी तैयारियां लगभग अंतिम चरण में हैं, लेकिन जबलपुर की फाइल पीएचक्यू में धूल खा रही है।
सैटेलाइट का प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में
दुर्गम और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों जैसे घने जंगलों, पहाड़ों में पारंपरिक वायरलेस और मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह फेल हो जाता है। इस बड़ी खामी को दूर करने के लिए पुलिस ने अपने खुद के छोटे-छोटे सैटेलाइट की योजना बनाई थी। लक्ष्य था कि कोना-कोना पुलिस की रडार और संपर्क में रहे। बताया जाता है कि इंदौर में इसके लिए जमीनी खाका तैयार हो चुका है, लेकिन जबलपुर का यह सैटेलाइट प्रोजेक्ट भी स्वीकृति के अभाव में अटका पड़ा है।
ड्रोन स्कूल तो खुला, पर आधुनिक स्पेशल ड्रोन गायब
आधुनिक सर्विलांस और दंगों या आपातकाल में हवाई निगरानी के लिए पुलिस बेड़े में स्पेशल ड्रोन शामिल किए जाने थे। इसके लिए इंदौर में बकायदा ड्रोन ट्रेनिंग स्कूल खोल दिया गया। पुलिसकर्मियों को पुराने और कबाड़ हो चुके ड्रोन्स से ट्रेनिंग भी दे दी गई। लेकिन ट्रेनिंग पूरी होने के महीनों बाद भी नए और आधुनिक ड्रोन जबलपुर पुलिस को नहीं मिल सके हैं। स्थिति यह है कि यहाँ धरातल पर एक भी नया ड्रोन नहीं पहुंचा है।
10 साल से अटका डिजिटल ट्रंकिंग सिस्टम
पुलिस संचार की रीढ़ कहे जाने वाले वायरलेस सिस्टम को अपग्रेड करने के लिए ऑटोमैटिक आधुनिक ट्रंकिंग सिस्टम लाया जाना था। जानकारों की माने ता इस आधुनिक प्रणाली में एक मास्टर कंट्रोलर होता है। इसके जरिए शहर की सभी 12 से 13 सौ वायरलेस सेट एक क्लिक पर एक साथ सेट हो जाते हैं। वर्तमान में चल रहे पुराने सिस्टम में हर एक हैंडसेट को अलग से मैन्युअली ट्यून करना पड़ता है, जो आपातकाल में समय बर्बाद करता है। इस प्रोजेक्टर को धरातल पर लाने की कवायद में 10 साल का लंबा वक्त बीत गया, लेकिन यह रिप्लेसमेंट प्रोजेक्ट आज तक पूरा नहीं हुआ। भोपाल-इंदौर में थोड़ा-बहुत काम हुआ, पर जबलपुर को खाली हाथ छोड़ दिया गया। आज आलम यह है कि कई बार शहर में बैठे अधिकारियों की बात देहात (ग्रामीण इलाकों) के थानों तक नहीं पहुंच पाती है।
जब कनेक्टिविटी टूटने से लहूलुहान हुई थी पुलिस
आधुनिक ट्रंकिंग सिस्टम की कमी किस कदर जानलेवा साबित हो सकती है, इसका गवाह इतिहास रहा है। शहर में भडक़े एक उपद्रव के दौरान उग्र भीड़ ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस बल को घेरकर हमला कर दिया था। उस वक्त पुलिसकर्मी अपने पुराने वायरलेस सेट पर लगातार चीख रहे थे फोर्स भेजें… अतिरिक्त फोर्स भेजें…। लेकिन खराब कनेक्टिविटी के कारण देहात और मुख्य लाइन तक उनकी आवाज ही नहीं पहुंची। समय पर बैकअप फोर्स न मिलने के कारण उपद्रवियों ने पुलिसकर्मियों को बुरी तरह घायल कर दिया। पिछले 10 सालों में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने लिखित में इस सिस्टम की मांग की है, लेकिन भोपाल मुख्यालय से मंजूरी अटकी है। बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या किसी और बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है या फिर जबलपुर की सुरक्षा को जानबूझकर हाशिए पर धकेला जा रहा है?
इनका कहना है
सीसीटीव्ही कैमरे, सैटेलाइट, आधुनिक स्पेशल ड्रोन, ट्रंकिंग सिस्टम के प्रोजेक्ट पुलिस मुख्यालय में मंजूरी के लिए भेजे गए थे। जिन पर भोपाल स्तर पर काम चल रहा है। ये फाइलें लंबित है।
सुनील राजौरे, रेडियो एसपी

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