
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक व न्यायाधीश विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े करीब 100 मामलों पर मंगलवार को सुनवाई जारी रही। कोर्ट के समक्ष सामान्य वर्ग के याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती ने लगभग दो घंटे तक बहस करते हुए तर्क दिया कि राज्य सरकार ने आरक्षण बढ़ाने से पहले सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आवश्यक क्वांटिफायबल डेटा एकत्र नहीं किए। केवल जनसंख्या के आधार पर आरक्षण बढ़ाना संविधान और सुप्रीम कोर्ट के तय सिद्धांतों के विपरीत है।
बहस के दौरान बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय के सर्वे की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सर्वे में केवल ओबीसी वर्ग के करीब 10 हजार लोगों को शामिल किया गया, अन्य वर्गों को नहीं। ऐसे में तुलनात्मक अध्ययन के अभाव में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का सही आकलन संभव नहीं है। यह भी दलील दी गई कि सर्वे के अनुसार ओबीसी वर्ग के 23.91 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षित हैं।
सामान्य वर्ग की ओर से आल इंडिया सर्वे आन हायर एजुकेशन का हवाला देते हुए कहा गया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व लगभग 77 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इसलिए ठोस और वस्तुनिष्ठ आंकड़ों के बिना आरक्षण बढ़ाने का निर्णय उचित नहीं ठहराया जा सकता। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने अवगत कराया कि हाईकोर्ट की विशेष युगलपीठ अब बुधवार को भी सुनवाई जारी रखेगी। पहले सामान्य वर्ग की बहस पूरी होगी, इसके बाद राज्य शासन और ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपनी दलीलें प्रस्तुत करेंगे। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने बताया कि सामान्य वर्ग की ओर से अमन लेखी तथा यूथ फॉर इक्वेलिटी की ओर से गोपाल शंकर नारायण पहले ही अपनी दलीलें पूरी कर चुके हैं।
