
इंदौर. करीब 15 साल पुराने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में विशेष पीएमएलए कोर्ट ने आरोपी दंपती को दोषमुक्त कर दिया, लेकिन ईडी द्वारा अटैच की गई करीब 2.19 करोड़ रुपए की संपत्ति पर किसी ने दावा नहीं किया. ऐसे में अदालत ने पूरी संपत्ति शासन के पक्ष में राजसात करने के आदेश दिए हैं.
वर्ष 2011 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने महू स्थित सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के तत्कालीन क्लर्क राजेश नीम और अंजना नीम के खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज किया था. इससे पहले राजेश नीम के खिलाफ धोखाधड़ी और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) एक्ट के तहत पुलिस प्रकरण दर्ज हुआ था. इसी मूल अपराध को आधार बनाकर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की थी. मूल आपराधिक मामले में फरवरी 2023 में दोनों आरोपियों को अदालत से दोषमुक्त कर दिया था. इसके बाद उन्होंने विशेष पीएमएलए कोर्ट में आवेदन देकर मनी लॉन्ड्रिंग प्रकरण से भी बरी किए जाने की मांग की.
विशेष न्यायाधीश राजेंद्र कुमार पाटीदार ने सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि मूल अपराध में आरोपी अंतिम रूप से दोषमुक्त हो जाता है तो उसके खिलाफ पीएमएलए के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि मूल मामले में दोषमुक्ति के फैसले के खिलाफ राज्य शासन की ओर से हाईकोर्ट में कोई अपील दायर होने का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है. ऐसे में मनी लॉन्ड्रिंग का मामला जारी रखने का आधार नहीं बचता और दोनों आरोपियों को दोषमुक्त किया जाता है.
बैंक खाते, प्लॉट और संपत्तियां भी हुईं राजसात…
जांच के दौरान ईडी ने बैंक खातों के साथ इंदौर के इंद्रपुरी स्थित संपत्ति और महू के एक प्लॉट समेत करीब 2.19 करोड़ रुपए मूल्य की संपत्ति अटैच की थी. सुनवाई के दौरान आरोपियों ने इन बैंक खातों और अटैच संपत्तियों पर अपना कोई दावा पेश नहीं किया तथा कहा कि यह उनकी संपत्ति नहीं है. इसके बाद विशेष कोर्ट ने 14 जुलाई को आदेश जारी कर पूरी अटैच संपत्ति को शासन के पक्ष में राजसात करने के निर्देश दिए.
