नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में खनिजों पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े नियमों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि रॉयल्टी और अन्य शुल्कों को खनिज के ‘बिक्री मूल्य’ में शामिल करना पूरी तरह वैध है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि वित्तीय उपायों की वैधता जांचते समय अदालतों को जनहित को प्राथमिकता देनी चाहिए और बिना ठोस आधार के सरकारी नियमों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
राजस्व को नुकसान से बचाने का प्रयास
इस मामले में केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि यदि इन नियमों को रद्द किया गया, तो नीलामी वाली खदानों से सरकार को लगभग 7 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो सकता है। न्यायालय ने सरकार द्वारा प्रस्तुत डेटा और चार्ट्स का अवलोकन किया, जिसमें खदानों से खनिजों की बिक्री और मूल्य निर्धारण में की गई हेरफेर को उजागर किया गया था। बेंच ने माना कि बिक्री मूल्य में रॉयल्टी, डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) और नेशनल मिनरल एक्सप्लोरेशन ट्रस्ट (NMET) के भुगतानों को शामिल करना टैक्स चोरी रोकने के लिए एक उचित नियामक उपाय है।
याचिका खारिज, अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन नहीं
याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता) का उल्लंघन बताया था, लेकिन अदालत ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस विश्वनाथन ने स्पष्ट किया कि विवादित नियम मनमाने या अतार्किक नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य खनिज संसाधनों का उचित मूल्य सुनिश्चित करना और चोरी पर अंकुश लगाना है। यह फैसला माइनिंग इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा नजीर है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि कर प्रणालियों में पारदर्शिता लाने के लिए अपनाई गई प्रक्रियाएं संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरती हैं।

