बेंगलुरु, 08 जुलाई (वार्ता) कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बुधवार को सवाल उठाया कि सरकारी ज़मीन हड़पने के मामले में कांग्रेस के मौजूदा विधायक एमसी सुधाकर को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया, जबकि वे कथित तौर पर इसके लाभार्थी थे।
न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने कहा कि अदालत के समक्ष पेश किए गये सबूतों से पहली नज़र में यह पता चलता है कि श्री चौडारेड्डी के पुत्र एमसी बालाजी और एमसी सुधाकर सरकारी ज़मीन पर कथित कब्ज़े से सीधे तौर पर लाभान्वित हुए थे, फिर भी दोनों आरोपियों की सूची से ‘साफ़ तौर पर गायब’ हैं।
न्यायालय ने इसके साथ ही पूर्व मंत्री एमसी चौडारेड्डी और चिंतामणि नगर पालिका के पूर्व आयुक्त बीएच नारायणप्पा के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।
श्री चौडारेड्डी और श्री नारायणप्पा द्वारा 2017 के आपराधिक मामले को रद्द करने के लिए दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए अदालत ने कहा, “सरकारी ज़मीन हड़पने के कथित मामलों में लाभार्थी कैसे अपराध की जांच के दायरे से बाहर रह जाते हैं, यह गंभीर चिंता का विषय है।” जांच एजेंसी को छह महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश देते हुए न्यायालय ने कहा कि राजनीतिक पद पर बैठे लोगों द्वारा ज़मीन हड़पने के आरोप जनता के भरोसे की नींव पर चोट करते हैं और इन्हें शुरुआती स्तर पर ही नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि आम नागरिकों द्वारा ज़मीन पर कब्ज़ा करना एक गंभीर अपराध है, लेकिन जब सरकारी पद पर बैठे लोग इसके फ़ायदे उठाने वाले हों, तो इससे प्रशासन पर जनता का भरोसा कम होता है। अदालत ने माना कि इस स्टेज पर जांच को रोकना सच को सामने आने से रोकने जैसा होगा। यह मामला चिंतामणि तालुक के कन्नमपल्ली गांव में सर्वे नंबर 11 में एक एकड़ और 18 गुंटा सरकारी ज़मीन पर कथित कब्ज़े से जुड़ा है, जिसे राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी ज़मीन के तौर पर दर्ज किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार श्री चौडारेड्डी के परिवार के पास सर्वे नंबर 12 और 13 में सटी हुई ज़मीनें थीं। वर्ष 1989 में चिंतामणि से विधायक चुने जाने के बाद, उन्होंने उन कृषि ज़मीनों को गैर-कृषि कार्यों के लिए बदलने की अर्ज़ी दी। इस प्रक्रिया के दौरान, कथित तौर पर सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किया गया और बाद में उसे उनके पुत्रों श्री बालाजी और श्री सुधाकर के बीच बांट दिया गया। यह भी आरोप लगाया गया है कि श्री बालाजी ने ‘सरकारी कर्मचारी गृह निर्माण सहकारी समिति’ के पक्ष में एक बिना पंजीकृत ‘सामान्य मुख्तारनामा’ तैयार की, जिससे रिहायशी प्लॉट बनाने और उनके परिवर्तन में मदद मिली और विवादित ज़मीन पर तीसरे पक्ष का अधिकार बन गया। ये कथित अनियमितताएं तब सामने आयी जब चिंतामणि नगर परिषद के एक पार्षद ने शिकायत दर्ज करायी। शुरुआती जांच के बाद, तत्कालीन भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने 2017 में एक आपराधिक मामला दर्ज किया।
न्यायालय ने जांच में दखल देने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि सरकारी ज़मीन को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया गया। इसके लिए लेआउट बनाये गये, प्लॉट बेचे गये, नगरपालिका के खाते जारी किये गये और तीसरे पक्ष के अधिकार बनाये गये, जिससे असल सरकारी मालिकाना हक छिप गया। न्यायालय ने चिंतामणि टाउन नगरपालिका परिषद के तत्कालीन आयुक्त नारायणप्पा के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द करने से भी इनकार कर दिया और कहा कि इन आरोपों की विस्तृत जांच की ज़रूरत है। याचिकाओं को खारिज करते हुए न्यायालय ने जांच एजेंसी को छह महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया।
