निलंबित सिविल जज को हाईकोर्ट से झटका

जबलपुर। फर्जी ऑर्डरशीट जारी करने के आरोप में निलंबित सिविल जज ने विभागीय कार्यवाही को निरस्त किये जाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि अपराधिक प्रकरण तथा विभागीय कार्यवाही के तथ्य एक जैसे है। विभागीय जांच में बचाव में दिये गये तथ्य उजागर होने से आपराधिक प्रकरण में असर पड़ सकता है। हाईकोर्ट जस्टिस आनंद पाठक तथा जस्टिस बी पी शर्मा की युगलपीठ ने याचिका को निरस्त करते हुए अपने आदेश में कहा है कि आरोपी न्यायिक सेवा के एक सदस्य से संबंधित हैं। न्यायपालिका में जनता का विश्वास है और यह संवैधानिक व्यवस्था के आधारभूत स्तंभों में एक है। आपराधिक कार्यवाही का समय अनिश्चितकालीन है। विभागीय कार्यवाही में अनावश्यक देरी नहीं की जा सकती और प्रशासनिक अधिकारियों को अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है।

निलंबित सिविल जज विजेन्द्र सिंह रावत की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि उन पर आरोप है कि इंदौर में पदस्थ रहने के दौरान एक आपराधिक प्रकरण में आईएएस संतोष वर्मा को दोषमुक्त किये जाने के संबंध में 6 अक्टूबर 2020 को फर्जी आदेश जारी किये थे। वास्तव में अपराधिक प्रकरण लंबित था और आईएएस को पदोन्नति का लाभ मिल सके,इसके लिए ऐसा किया गया था। हाईकोर्ट ने उन्हे निलंबित करते हुए अपने विशेष अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए 19 दिसम्बर 2025 को चार्ज-शीट व कारण बताओ नोटिस की जारी किये थे। याचिका में विभागीय कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गयी थी।

याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिये गये कि घटनाक्रम से जुड़ा आपराधिक मामला लंबित रहने के दौरान विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी है। कथित घटना साल 2020 की है, जबकि चार्ज-शीट दिसंबर 2025 में जारी की गई है। इतने लंबे समय के बाद अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करना अनुचित है और निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन है। आपराधिक मुकदमा और विभागीय कार्यवाही एक ही घटना और काफी हद तक एक जैसे आरोपों पर आधारित हैं। दोनों कार्यवाहियों में गवाह, दस्तावेज और सबूत एक ही हैं, और इसलिए, विभागीय कार्यवाही जारी रखने से आपराधिक मुकदमे में याचिकाकर्ता के बचाव पर गंभीर असर पड़ेगा। विभागीय जांच में याचिकाकर्ता को अपना बचाव बताने के लिए मजबूर करने से लंबित आपराधिक मामले में उसके अधिकारों पर बुरा असर पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेष का हवाला देते हुए कहा गया कि विभागीय कार्यवाही और आपराधिक कार्यवाही एक जैसे तथ्यों पर आधारित हों आपराधिक मामले के खत्म होने तक विभागीय कार्यवाही को रोकना बेहतर होगा।

शासकीय अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि याचिकाकर्ता के पास जांच अधिकारी के सामने अपना बचाव पेश करने और अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान अपनी बेगुनाही साबित करने का पर्याप्त अवसर है। याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोप बहुत गंभीर प्रकृति के हैं और इनमें एक न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी पर सवाल उठता है। ये आरोप जाली फैसला तैयार करने और एक आरोपी व्यक्ति को गैर-कानूनी लाभ पहुंचाने से संबंधित हैं। ऐसे आरोप न्याय प्रशासन में जनता के भरोसे की नींव पर चोट करते हैं और इसलिए इनके लिए गहन अनुशासनात्मक जांच की आवश्यकता है। आपराधिक कार्यवाही और विभागीय जांच को एक साथ जारी रखने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण का यह दायित्व है कि वह यह पता लगाए कि क्या किसी न्यायिक अधिकारी का आचरण उसके पद के अनुरूप ईमानदारी और उचित व्यवहार के मानकों के अनुसार है। ऐसी जांच को आपराधिक कार्यवाही के निष्कर्ष का इंतजार करते हुए अनिश्चित काल के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता है। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ याचिका को खारिज कर दिया।

Next Post

मनासा में 40 स्कूली बच्चों से भरी वैन पलटी:ड्राइवर मौके से भागा, लोग बोले- क्षमता से अधिक स्टूडेंट्स को बैठाया था

Wed Jul 8 , 2026
नीमच। जिले की मनासा तहसील में बुधवार को बरखेड़ा-बरखेड़ी रास्ते पर गैलेक्सी पब्लिक कॉन्वेंट स्कूल के करीब 40 बच्चों से भरी वैन पलट गई। गनीमत रही कि इस हादसे में किसी भी बच्चे को गंभीर चोट नहीं आई। वारदात के बाद वैन का ड्राइवर मौके से भाग निकला। यह वैन […]

You May Like