पटना, 07 जुलाई (वार्ता) बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मिथिला संस्कृत शोध संस्थान, दरभंगा और ऑक्सफोर्ड संस्कृत टेक्स्ट सोसाइटी के बीच प्रस्तावित संस्थागत सहयोग (एम०ओ०यू०) को बिहार के लिए एक ऐतिहासिक अवसर बताया और कहा कि यह पहल बिहार की गौरवशाली सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। मुख्यमंत्री श्री चौधरी ने मंगलवार को कहा कि मिथिला की समृद्ध ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य, प्राचीन पांडुलिपियों एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, डिजिटलीकरण, शोध तथा वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोद द्वारा प्रारंभ किए गए ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ का उद्देश्य देश भर में सुरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, संरक्षण, डिजिटलीकरण तथा उन्हें वैश्विक शोध समुदाय के लिए सुलभ बनाना है। ऐसे में मिथिला संस्कृत शोध संस्थान और ऑक्सफोर्ड संस्कृत टेक्स्ट सोसाइटी के बीच प्रस्तावित सहयोग इस राष्ट्रीय मिशन को बिहार में प्रभावी रूप से आगे बढ़ाने का माध्यम बनेगा।
श्री चौधरी ने कहा कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रख्यात संस्कृतविद् एवं ऑक्सफोर्ड संस्कृत टेक्स्ट सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष प्रोफेसर दिवाकर आचार्य द्वारा मिथिला संस्कृत शोध संस्थान के साथ औपचारिक संस्थागत सहयोग का प्रस्ताव भेजा जाना बिहार के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों के साथ कार्यरत इस प्रतिष्ठित संस्था द्वारा बिहार के इस ऐतिहासिक संस्थान के साथ सहयोग की पहल उसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमाण है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जनवरी 2025 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रगति यात्रा के दौरान दरभंगा में मिथिला संस्कृत शोध संस्थान के जीर्णोद्धार एवं आधुनिकीकरण के लिए फंड देने की घोषणा की थी। इसके बाद फरवरी 2025 में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में संस्थान के भवनों के निर्माण, परिसर के विकास और पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए लगभग 57 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई, जिस पर कार्य चल रहा है। उन्होंने कहा कि मिथिला संस्कृत शोध संस्थान और ऑक्सफोर्ड संस्कृत टेक्स्ट सोसाइटी के बीच प्रस्तावित संस्थागत सहयोग को आवश्यक प्रशासनिक समर्थन मिलने से बिहार की यह अमूल्य धरोहर वैश्विक स्तर पर नई पहचान प्राप्त करेगी और भारत की ज्ञान-संपदा के संरक्षण एवं प्रसार को नई दिशा मिलेगी।
