चीतल का मांस साबित करने में नाकाम रही एफएसएल

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस राजेंद्र कुमार वानी की एकलपीठ के समक्ष सुनवाई में आए कटनी के विजयराघवगढ़ वन परिक्षेत्र के चर्चित चीतल शिकार मामले में वैज्ञानिक जांच ही अभियोजन की सबसे कमजोर कड़ी बन गई। जब एफएसएल पके हुए मांस को चीतल का होने की पुष्टि नहीं कर सकी तो हाईकोर्ट ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य मानते हुए आरोपी को नियमित जमानत दे दी।

दरअसल, कटनी जिले के विजयराघवगढ़ वन परिक्षेत्र में दर्ज चीतल शिकार प्रकरण में हाईकोर्ट ने आरोपित प्रीतम भूमिया को नियमित जमानत दे दी। कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना उपलब्ध परिस्थितियों में जमानत मंजूर की।

आवेदक की ओर से अधिवक्ता शांतनु तिवारी ने दलील दी कि वन विभाग ने जिस पके हुए मांस को चीतल का बताकर जब्त किया था, उसकी एफएसएल रिपोर्ट में यह निर्धारित ही नहीं हो सका कि वह मांस किस वन्यजीव का है। उन्होंने यह भी बताया कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है, आरोप पत्र दाखिल हो चुका है और आरोपी एक मार्च 2026 से न्यायिक अभिरक्षा में है। इन दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके तथा समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपित ट्रायल में नियमित उपस्थित रहेगा, गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा, कोई नया अपराध नहीं करेगा व कोर्ट की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेगा।

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