बेंगलुरु | कर्नाटक हाईकोर्ट ने अंतरिम गुजारा भत्ते (मेंटेनेंस) को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और अपने पति से अधिक कमाई करती है, तो वह पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। जस्टिस चिल्लकुर सुमलता की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें एक पति को अपनी पत्नी को हर महीने 20,000 रुपये अंतरिम मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि जेंडर के आधार पर पति को हमेशा गुजारा भत्ता देने के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और वित्तीय स्थिति
यह मामला 2024 में हुए एक विवाह से जुड़ा है, जो कुछ ही महीनों बाद विवादों में घिर गया। कानूनी कार्यवाही के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पति की मासिक आय 60,646 रुपये थी, जबकि पत्नी की आय 1 लाख रुपये प्रति माह थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जब पत्नी वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर हो और उसकी आय पति से काफी अधिक हो, तो मेंटेनेंस का आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट्स को पारंपरिक रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर हर मामले के वास्तविक तथ्यों की निष्पक्ष जांच करने की हिदायत दी है।
न्याय की नई दिशा और भविष्य के निर्णय
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह आदेश केवल अंतरिम मेंटेनेंस के मुद्दे तक सीमित है और इसका प्रभाव शादी से जुड़े किसी भी अंतिम न्यायिक निर्णय पर नहीं पड़ेगा। बेंच ने चेतावनी दी है कि अंतरिम गुजारा भत्ता केवल उन्हीं परिस्थितियों में दिया जाना चाहिए, जहाँ पत्नी यह सिद्ध कर सके कि उसके पास अपना जीवनयापन करने के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन नहीं हैं। इस फैसले को पारिवारिक कानून में एक प्रगतिशील कदम माना जा रहा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि मेंटेनेंस का प्रावधान वास्तव में जरूरतमंदों की सहायता के लिए ही हो।

