प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भारत सरकार के सचिवों के साथ हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में प्रशासन को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि शासन जटिल नियमों और प्रक्रियाओं का पर्याय नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और कारोबार को सरल बनाने का माध्यम होना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट कहा कि गवर्नेंस ऐसी नहीं होनी चाहिए जो नियमों के बोझ तले दब जाए, बल्कि उसका उद्देश्य आम नागरिक और उद्योग जगत के लिए सुविधाजनक व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए. यह सोच विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है.
आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है.ऐसे समय में यदि सरकारी प्रक्रियाएं अनावश्यक रूप से लंबी, जटिल और समय लेने वाली रहेंगी, तो निवेश, नवाचार और उद्यमिता की गति प्रभावित होगी. पिछले एक दशक में केंद्र सरकार ने लाइसेंस, अनुमतियों और अनुपालन संबंधी अनेक नियमों को समाप्त या सरल बनाया है. इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं.भारत की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की स्थिति में सुधार हुआ है, स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा मिला है और डिजिटल गवर्नेंस ने सरकारी सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच आसान बनाई है.
प्रधानमंत्री ने बैठक में सचिवों से योजनाओं के प्रभाव का आकलन केवल फाइलों या आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन में आए वास्तविक बदलाव के आधार पर करने का आग्रह किया.यह प्रशासनिक सोच में एक आवश्यक परिवर्तन है.किसी भी सरकारी योजना की सफलता उसकी घोषणा से नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाले लाभ से तय होती है. यदि योजनाओं का प्रभाव नागरिक महसूस नहीं कर रहे हैं, तो उनमें सुधार की आवश्यकता है.
बैठक में सचिवों ने आगामी रणनीतियों का भी खाका प्रस्तुत किया. इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार केवल वर्तमान उपलब्धियों पर संतुष्ट नहीं है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए भी तैयारी कर रही है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सेवाओं, डेटा आधारित निर्णय प्रणाली और विभागों के बीच बेहतर समन्वय आने वाले वर्षों में प्रशासन की नई पहचान बन सकते हैं.हालांकि, तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और संवेदनशीलता भी जुड़ी रहे.
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सुशासन का अर्थ केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि समयानुकूल सुधार करना भी है. कई ऐसे कानून और प्रक्रियाएं आज भी लागू हैं जो दशकों पहले की परिस्थितियों के अनुरूप बनाई गई थीं. बदलते आर्थिक और सामाजिक परिवेश में उनकी समीक्षा आवश्यक है. अनावश्यक नियम भ्रष्टाचार, देरी और नागरिकों की परेशानियों को जन्म देते हैं. इसलिए समय-समय पर नियमों का सरलीकरण और प्रशासनिक सुधार लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य आवश्यकता है.
विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास से पूरा नहीं होगा.इसके लिए ऐसी शासन व्यवस्था चाहिए जो पारदर्शी, उत्तरदायी, तकनीक-सक्षम और नागरिक केंद्रित हो. प्रधानमंत्री का यह संदेश केवल नौकरशाही के लिए निर्देश नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति में परिवर्तन का आह्वान है. यदि मंत्रालय और विभाग परिणाम आधारित कार्यशैली अपनाते हुए नागरिक सुविधा को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे, तो शासन पर जनता का विश्वास और मजबूत होगा.यही विश्वास विकसित, आत्मनिर्भर और सक्षम भारत की सबसे मजबूत नींव सिद्ध होगा.
