
प्रवेश कुमार मिश्र नई दिल्ली। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में बहुप्रतीक्षित फेरबदल को लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में जबरदस्त हलचल दिखाई दे रही है. कहा जा रहा है कि सभी मंत्रियों को दिल्ली में ही रहने को लेकर अनौपचारिक निर्देश दिया गया है. वैसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जुलाई के शुरुआती हफ्तों में इंडोनेशिया,ऑस्ट्रेलिया व अन्य देशों के दौरे पर जाने वाले हैं. इसलिए माना जा रहा है कि जुलाई के आरंभिक दिनों में ही मंत्रिमंडल विस्तार हो जाएगा. राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि मोदी इस मंत्रिमंडल विस्तार के माध्यम से एक तीर से दो निशाने लगाना चाहते हैं.
जहां एक तरफ सरकार की सुस्ती दूर कर मंत्रालयों को अधिक परिणामोन्मुखी बनाने पर फोकस किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर सत्तर पार वरिष्ठतम नेताओं के प्रशासनिक अनुभव के सार्थक उपयोग के लिए बड़े राज्यों के राज्यपाल बनाए जा सकते हैं तथा वरिष्ठ नेताओं की सांगठनिक क्षमता का उपयोग कर आगामी चुनावों के लिए भाजपा की जमीनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगाया जा सकता है. हालांकि, मोदी शैली के तहत अंतिम फैसलों में हमेशा चौंकाने वाले तत्व होते हैं, इसलिए कोई भी भाजपाई वरिष्ठ नेता कुछ भी औपचारिक रूप से बोलने को तैयार नहीं है.
चर्चा है कि वित्त, मानव संसाधन, रेलवे, उपभोक्ता मामले, पेट्रोलियम मंत्रालय जैसे भारी-भरकम मंत्रालयों की जिम्मेदारी अपेक्षाकृत नए व उर्जावान मंत्रियों को दी जा सकती है. सूत्रों कि माने तो सीतारमण को शिक्षा विभाग, पीयूष गोयल या पूर्व आरबीआई गवर्नर शक्ति कांत दास को वित्त विभाग, अनुराग ठाकुर को रेलवे या वाणिज्य
विभाग, इसके अतिरिक्त परिवहन क्षेत्र में लंबा अनुभव रखने वाले नितिन गडकरी के कार्यभार में भी बदलाव कर उन्हें किसी नए इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट वाले मंत्रालय की कमान दी जा सकती है. पंजाब चुनाव को ध्यान में रखते हुए तरूण चुघ या राघव चढ्ढा, उत्तर प्रदेश चुनाव को ध्यान में रखते हुए दो ओबीसी व एक दलित चेहरा को बतौर राज्यमंत्री की जिम्मेदारी दी जा सकती है. इसके अलावा गठबंधन सहयोगी जदयू से संजय झा तथा शिवसेना शिंदे गुट से श्रीकांत शिंदे को मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है. सूत्रों की माने तो जिन मंत्रियों की छुट्टी होगी उनमें से कुछ वरिष्ठतम नेताओं को आगामी महीनों में खाली हो रहे कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड के राज्यपालों के पदों पर समायोजित किया जा सकता है. बहरहाल, यह फेरबदल केवल मंत्रियों के चेहरे बदलने का जरिया नहीं होगा, बल्कि इसके जरिए 2027 के विधानसभा चुनावों और सरकार की 2029 की दीर्घकालिक विकास नीतियों का रोडमैप भी तय किया जाएगा.
