मध्य प्रदेश की पहचान केवल भौगोलिक दृष्टि से विशाल राज्य होने की नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में भी शामिल है. यही जंगल प्रदेश को ‘टाइगर स्टेट’ और ‘चीता स्टेट’ का गौरव दिलाते हैं. वन संपदा ही प्रदेश के पर्यावरण, जैव विविधता, जल संरक्षण और पर्यटन अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है. इसलिए जंगलों पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा या कटाई केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि प्रदेश के भविष्य पर सीधा हमला है.
खंडवा जिले के आमाखुजरी क्षेत्र में वन विभाग की टीम पर हुआ हिंसक हमला अत्यंत चिंताजनक है. जब वनकर्मी सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने और पुनर्वनीकरण के लिए पहुंचे, तब सैकड़ों लोगों ने उन पर पत्थरों, गोफनों और लाठियों से हमला कर दिया. कई वनकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए. यदि सरकारी कर्मचारी अपने वैधानिक कर्तव्य का निर्वहन भी सुरक्षित वातावरण में नहीं कर सकते, तो यह कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती है.
चिंता की बात यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है. पिछले दो वर्षों में केवल खंडवा और बुरहानपुर क्षेत्र में वन विभाग की टीम पर दस बार हमले हो चुके हैं. इससे स्पष्ट है कि वन अतिक्रमण अब संगठित माफिया का रूप ले चुका है. हर वर्ष वर्षा ऋतु के दौरान जंगल काटकर अवैध खेती करने और सरकारी भूमि पर कब्जा करने का सुनियोजित प्रयास किया जाता है. यदि समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो प्रदेश की वन संपदा को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी.
सरकार ने इस बार 600 से अधिक कर्मचारियों, पुलिस बल, प्रशासन और आधुनिक तकनीक की सहायता से व्यापक अभियान चलाकर बड़ी मात्रा में वनभूमि को मुक्त कराया है. अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किए गए हैं और पुनर्वनीकरण का कार्य भी प्रारंभ हुआ है. यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन केवल अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा. आवश्यकता इस बात की है कि वन कटाई और अतिक्रमण के पूरे नेटवर्क की पहचान कर उसके आर्थिक और आपराधिक तंत्र को भी ध्वस्त किया जाए.
वनकर्मियों की सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. यदि परिस्थितियां लगातार हिंसक बनी रहती हैं, तो उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, आधुनिक संचार व्यवस्था, ड्रोन निगरानी तथा आवश्यकतानुसार सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध कराई जानी चाहिए. साथ ही, वन अपराधों के मामलों में त्वरित सुनवाई और कठोर दंड सुनिश्चित किए जाएं, ताकि कानून का भय स्थापित हो सके.
जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं. वे नदियों के स्रोत हैं, वन्यजीवों का घर हैं, आदिवासी जीवन का आधार हैं और आने वाली पीढिय़ों की प्राकृतिक धरोहर हैं. इनके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल वन विभाग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है. स्थानीय समुदायों को भी संरक्षण अभियान का सहभागी बनाना होगा, ताकि वे माफिया के प्रभाव में आने के बजाय जंगल बचाने की मुहिम का हिस्सा बनें.
मध्य प्रदेश यदि अपनी प्राकृतिक पहचान और पर्यावरणीय विरासत को सुरक्षित रखना चाहता है, तो वन कटाई और अतिक्रमण करने वाले माफिया के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी होगी. अब समय आ गया है कि ऐसे तत्वों का केवल दमन नहीं, बल्कि उनके पूरे तंत्र का समूल नाश किया जाए. यही प्रदेश, पर्यावरण और आने वाली पीढिय़ों के हित में सबसे आवश्यक कदम होगा.
