भारत का दक्षिण एशिया का ‘कैंसर कैपिटल’ बनना केवल एक चिंताजनक आंकड़ा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ी गंभीर चुनौती का संकेत है. लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया की रिपोर्ट और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2022 में सार्क देशों में बाल कैंसर के 37,716 मामले सामने आए, जिनमें 25,939 मामले अकेले भारत के थे. यानी सार्क क्षेत्र के कुल बाल कैंसर मामलों में करीब 68.8 प्रतिशत हिस्सेदारी भारत की है. वैश्विक स्तर पर हर वर्ष कैंसर से पीडि़त होने वाले करीब चार लाख बच्चों में 50 हजार से अधिक भारत के होते हैं. दूसरे शब्दों में, दुनिया का लगभग हर आठवां बाल कैंसर मरीज भारत से है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि बीमारी के बढ़ते बोझ के मुकाबले उपचार के परिणाम अभी संतोषजनक नहीं हैं. विकसित देशों में बाल कैंसर से बच्चों के ठीक होने की दर 80 से 90 प्रतिशत तक है, जबकि भारत में यह करीब 60 प्रतिशत के आसपास है. बच्चों में सबसे आम ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर है, जो कुल बाल कैंसर मामलों में 35 से 50 प्रतिशत तक होता है. यह अंतर बताता है कि समस्या केवल कैंसर के बढ़ते मामलों की नहीं, बल्कि समय पर पहचान, उपचार की उपलब्धता, आर्थिक क्षमता और स्वास्थ्य ढांचे की भी है.
ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को बाल कैंसर को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं में स्पष्ट रूप से शामिल करना होगा. सबसे पहला कदम देश में बाल कैंसर के विश्वसनीय और एकीकृत आंकड़ों का राष्ट्रीय तंत्र तैयार करना होना चाहिए. अभी कई मामले पंजीकृत ही नहीं हो पाते या अलग-अलग स्वास्थ्य संस्थानों के आंकड़ों में बिखर जाते हैं. जब तक बीमारी का वास्तविक स्वरूप सामने नहीं आएगा, तब तक प्रभावी नीति बनाना कठिन रहेगा.
यहीं चेन्नई का मॉडल नई उम्मीद जगाता है. देश में बाल कैंसर के आंकड़ों को बेहतर बनाने के लिए बनाई गई पहली बाल कैंसर रजिस्ट्री से प्राप्त शोध में दो वर्ष तक बच्चों के सुरक्षित और जीवित रहने की दर 60 से 70 प्रतिशत दर्ज हुई है. इस मॉडल को केवल चेन्नई तक सीमित रखना उचित नहीं होगा. केंद्र सरकार को राज्यों के सहयोग से इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की दिशा में तत्काल पहल करनी चाहिए. प्रत्येक राज्य में क्षेत्रीय बाल कैंसर रजिस्ट्री बने और उन्हें एक राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ा जाए.
इसके साथ जिला स्तर पर स्क्रीनिंग, मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षित बाल कैंसर विशेषज्ञ, आधुनिक जांच सुविधाएं और सस्ती अथवा निशुल्क दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों के चिकित्सकों को शुरुआती लक्षण पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को उपचार के लिए बड़े शहरों तक पहुंचने में अनावश्यक देरी न हो.
बाल कैंसर के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों की जिम्मेदारी नहीं है. सरकारों को अभिभावकों में जागरूकता अभियान चलाने होंगे और उपचार के दौरान परिवारों को आर्थिक व सामाजिक सहायता भी देनी होगी. कैंसर से जंग में देरी जीवन और मृत्यु के बीच के अंतर को कम कर सकती है .
भारत के पास चेन्नई जैसा एक उपयोगी मॉडल मौजूद है. अब जरूरत इसे राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनाने की है. बाल कैंसर के आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं. सरकारों को अब उस चेतावनी को कार्रवाई में बदलना होगा. बच्चों की जिंदगी से जुड़ी इस लड़ाई में आधे-अधूरे प्रयास नहीं, बल्कि त्वरित, ठोस और निरंतर रणनीति ही देश को बेहतर परिणामों की ओर ले जा सकती है.
