इंदौर: विकास की रफ्तार में शहर की पुरानी बस्तियां मलबे में तब्दील होती जा रही हैं. सड़क चौड़ीकरण के नाम पर सैकड़ों मकान-दुकान और भवन तोड़ दिए गए, लेकिन जिन परिवारों ने वर्षों की मेहनत से आशियाना बनाया था, उनके पुनर्वास और रोजगार की चिंता आज भी सरकारी फाइलों में दबी नजर आ रही है.शहर के करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराने जिंसी हाट मैदान क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण के लिए बड़े पैमाने पर कार्रवाई की गई.
विकास परियोजना के तहत सैकड़ों मकान दुकान और भवन तोड़कर जमीन अधिग्रहित की गई, लेकिन प्रभावित परिवारों का कहना है कि उनके जीवन की गाड़ी आज तक पटरी पर नहीं लौट सकी. तीसरी पीढ़ी से इस क्षेत्र में रहने वाले परिवार बताते हैं कि कभी एक ही छत के नीचे रहने वाला संयुक्त परिवार आज अलग-अलग जगह किराए या छोटे मकानों में रहने को मजबूर हंै.
वर्षों से फुटकर व्यापार कर परिवार का पालन-पोषण करने वाले छोटे दुकानदारों का रोजगार भी उजड़ गया. तस्वीरों में दिखाई देता मलबा केवल ईंट-पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि उन परिवारों के टूटे सपनों की कहानी भी बयां करता हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार और प्रशासन विकास का श्रेय लेने में आगे हैं, लेकिन प्रभावितों के पुनर्वास उचित मुआवजे और रोजगार की व्यवस्था पर अब भी ठोस पहल नहीं की गई. विकास जरूरी है, लेकिन यदि उसके साथ इंसाफ न हो तो उसकी कीमत आम नागरिकों को अपनी पूरी जिंदगी से चुकानी पड़ती है.
यह बोले प्रभावित लोग...
विकास करना अच्छा है, लेकिन लोगों का बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है. गरीब आदमी उसमें पिस रहा है. अब वह दोबारा कैसे खड़ा होगा. सरकार को पुनर्वास के साथ मुआवजा देना चाहिए.
– मोहम्मद शकील
हमारे परिवार को यहां रहते सवा सौ वर्ष हो चुके हैं. शहर में पब्लिक बढ़ रही है, विकास के लिए जमीन ले रहे हैं तो उसका मुआवजा भी देना चाहिए.
– नियाज मोहम्मद
विगत पचास वर्षों से मैं यहां छोटा-मोटा व्यापार कर रहा था. मेरे जैसे कई लोगों की रोजी-रोटी छिन गई, अब आगे देखते हैं क्या होगा ईश्वर ही जाने.
– जय राम
