
महाकौशल की डायरी अविनाश दीक्षित। जब थक हारकर, बेबस मातृशक्तियां किसी अधिकारी के पैरों में गिरकर न्याय की भीख सार्वजनिक रूप से मांगने लगें तो स्पष्ट है कि सिस्टम की उदासीनता से वह त्रस्त हो चुकी हैं और न्याय के लिए उनके पास पैरों में गिरकर भीख मांगने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है। बीते बुधवार को घमापुर निवासी पीड़ित मां-बेटी को मौका मिला तो उन्होंने जबलपुर पहुंचे मुख्यमंत्री का काफिला रोका और रोकर अपनी व्यथा सुनाई। यह बेहद मार्मिक मामला जबलपुर से जुड़ा है जहां जबलपुर पुलिस अधिकारियों के साथ घमापुर थाना पुलिस के द्वारा आरोपियों पर एक्शन नहीं लिया गया तो मां-बेटी जिला प्रशासन के दरवाजे पर पहुंच गए और कलेक्ट्रेट में सार्वजनिक रूप से घुटनों में बैठकर रोते हुए न्याय की भीख मांगने लगे। जिसने ये नजारा देखा उसने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्र खड़े किए। दरअसल पीड़ित महिला ने प्रशासन को दिए आवेदन में आरोप लगाया है कि वर्ष 2022 से उसका परिवार लगातार प्रताड़ना और धमकियों का सामना कर रहा है और अपने आप को आरोपियों के सामने असुरक्षित महसूस कर रहा है। महिला का पति आरोपियों के हमले से घायल होकर अस्पताल में इलाजरत है। महिला और उसकी बेटी अर्से से क़ानून के रखवालों के लगभग हर दरवाजे पर दस्तक दे रही हैं, किन्तु न्याय – सुरक्षा की गुहार नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह दम तोड़ रही है। फिलहाल जबलपुर कलेक्टर ने घमापुर टीआई को त्वरित निर्देश देते हुए कह दिया था कि महिला व उसकी बेटी की मांगों पर त्वरित कार्रवाई की जाए, लेकिन हुआ ये कि बुधवार को जबलपुर प्रवास पर पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव के समक्ष पीड़ित महिला को अपनी व्यथा सुनानी पड़ी। सीएम तक पहुंची व्यथा की कथा का सार इतना ही है कि संबंधित पुलिस अधिकारियों को उनके आला अधिकारियों ने जमकर फटकार लगाई है। मामले में आगे क्या होगा यह कहना अभी मुश्किल है मगर पूरे मामले ये सवाल अभी भी खड़े हैं कि यदि कोई पीड़ित परिवार अपनी शिकायत लेकर थाने और संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों और प्रदेश के मुखिया तक पहुंचने के बाद भी खुद को असुरक्षित महसूस करे, तो उसे न्याय के लिए किस दरवाजे पर जाना चाहिए..? इस मामले ने एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि व्यवस्था से उम्मीद और निराशा के बीच झूल रहे आम नागरिक की मानसिक स्थिति को भी दर्शा दिया है।
धृतराष्ट्र बने जिला अध्यक्ष, संघर्ष करने वाले कांग्रेसियों का अपमान जारी…?
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा संगठन सृजन अभियान के माध्यम से पार्टी को मजबूत करने और जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मान दिलाने की मंशा के विपरीत इन दिनों बालाघाट जिला कांग्रेस में लगातार असंतोष, गुटबाजी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के आरोप सामने आ रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिला नेतृत्व संगठन को मजबूती देने के बजाय कुछ व्यक्तियों के प्रभाव में काम कर रहा है, जिससे समर्पित कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है। दरअसल जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर बिरसा क्षेत्र से आने वाले विधायक एवं जिला कांग्रेस अध्यक्ष संजय उइके को पुन: संगठन की कमान सौंपने से जुड़ा मामला है, जिसके चलते संगठन में विरोध के स्वर फूट पड़े हैं। इसके अलावा जिला कांग्रेस में हुई नई नियुक्तियों को लेकर आरोप लग रहे हैं कि जिन लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया है, उनमें से कई चेहरे ऐसे हैं जिन्हें पार्टी के कार्यक्रमों और आंदोलनों में कभी सक्रिय भूमिका निभाते देखा नहीं गया। जबकि सालों से कांग्रेस के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई है। खबर है कि राजा खान की नियुक्ति को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। संगठन के कई पदाधिकारी के साथ कार्यकर्ताओं का तो ये भी कहना है कि जिला अध्यक्ष ने धृतराष्ट्र की तरह आंखें बंद कर रखी हैं और संगठन में बढ़ते असंतोष, कार्यकर्ताओं की पीड़ा तथा अनुशासनहीनता को नजरअंदाज किया जा रहा है। परिणाम यह है कि कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित और अपमानित महसूस कर रहे हैं। विदित हो कि पिछले कुछ महीनों में वरिष्ठ कांग्रेसियों के अपमान, पदाधिकारियों के इस्तीफे, महिला कांग्रेस की नेता मधु गजभिए और पूर्व जिला पंचायत सदस्य रामकुमार नगपुरे से जुड़े विवादों ने भी संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाया है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिला अध्यक्ष समय रहते हस्तक्षेप कर विवादों को सुलझाने में असफल रहे, जिसके कारण छोटे-छोटे मुद्दे सार्वजनिक विवाद में बदलते गए। फिलहाल बालाघाट कांग्रेस में असंतोष की भट्टी जमकर सुलग रही है और पर्दे के पीछे से विरोधी हवा फूंके जा रहें हैं, ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी के शीर्ष नेता असंतोष की आग को ठंडा कैसे कर पाते हैं…..?
