उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक अधिकारी की उच्च न्यायालय में पदोन्नति की याचिका खारिज की

नयी दिल्ली, 22 जून (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को हिमाचल प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रुप में पदोन्नति पर विचार करने की अर्जी खारिज कर दी और मौखिक रूप से कहा कि इससे जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय कॉलेजियम को कोई न्यायिक निर्देश जारी नहीं किया जा सकता है। याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा वर्तमान में धर्मशाला में पारिवारिक न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने दलील दी कि उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उनसे कनिष्ठ अधिकारी के नामों की सिफारिश की थी, जिनकी पदोन्नति को बाद में उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने मंजूरी दे दी थी।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने दलील दी कि उच्चतम न्यायालय ने सितंबर 2024 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय कॉलेजियम को याचिकाकर्ता और एक अन्य न्यायिक अधिकारी की पदोन्नति के नामों पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा कि दूसरे अधिकारी के मामले में निर्देश पर कार्रवाई की गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता के संबंध में ऐसा कोई फिर से विचार नहीं किया गया। न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने यह कहते हुए इस दलील को मानने से इनकार कर दिया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने याचिकाकर्ता की याचिका खारिज कर दी। उच्चतम न्यायालय ने याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता की यह बात रिकॉर्ड की कि याचिकाकर्ता अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहता था।

हालांकि याचिकाकर्ता ने प्रशासनिक पक्ष पर उच्च न्यायालय की सही प्राधिकारी से संपर्क करने या दूसरे न्यायिक उपायों का इस्तेमाल करने की आज़ादी मांगी। इस बात को रिकॉर्ड में लेते हुए अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया। उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने तीन जून को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए न्यायिक अधिकारी चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल के नामों को मंजूरी दे दी थी। इससे पहले, 2024 में जिला न्यायाधीश चिराग भानु सिंह और अरविंद मल्होत्रा ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पदोन्नति के लिए सिफारिश करते समय उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उनकी मेरिट और वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ किया था। उस साल सितंबर में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को उनकी उम्मीदवारी पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया था।

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