जिनेवा, 19 जून (वार्ता) ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध और ब्रिटेन में प्रतिबंध की घोषणा के बीच बच्चों के ऑनलाइन उत्पीड़न, लत लगने, आत्महत्या जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस छिड़ गयी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) समर्थित एक अध्ययन के अनुसार, किशोरों में सोशल मीडिया की लत साल 2018 के सात प्रतिशत से बढ़कर 2022 में 11 प्रतिशत हो गयी। सर्वे के मुताबिक रोमानिया, आयरलैंड और माल्टा में 15 वर्षीय किशोरों में इसकी लत के सबसे ऊंचे मामले दर्ज किए गए, जबकि नीदरलैंड, डेनमार्क और एस्टोनिया में यह स्तर सबसे कम पाया गया है।
रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों में सोशल मीडिया की लत काफी अधिक है। रोमानिया में 28 प्रतिशत लड़कियों ने इस समस्या को स्वीकार किया, जबकि लड़कों में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत था। शोध के अनुसार, लड़कियों को सोशल मीडिया पर सुंदर दिखने को लेकर अधिक दबाव और हीनभावना का सामना करना पड़ता है, साथ ही वे ऑनलाइन उत्पीड़न का भी अधिक शिकार होती हैं।
इस बढ़ते संकट के बीच बच्चों के लिए ऐसे मंचों पर प्रतिबंध लगाने को लेकर भारी राजनीतिक और जन समर्थन मिल रहा है। एक हालिया सर्वे के अनुसार, फ्रांस में 79 प्रतिशत, ब्रिटेन में 76 प्रतिशत, जर्मनी में 74 प्रतिशत और इटली में 70 प्रतिशत लोग 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में हैं। विशेष रूप से माता-पिता इस तरह के कदमों का सबसे अधिक समर्थन कर रहे हैं।
जनता की इस मांग को देखते हुए यूरोपीय सरकारें तेजी से कानून बना रही हैं। फ्रांस की नेशनल असेंबली ने 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को मंजूरी दे दी है, जबकि स्पेन न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 16 वर्ष करने का प्रस्ताव लाया है। इस रेस में ग्रीस सबसे आगे निकल गया है, जहाँ प्रधानमंत्री ने 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की है, जिस पर इस गर्मी में संसद में मतदान होना है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन प्रतिबंधों को लागू करने में उम्र के सत्यापन और यूरोप में यूरोपीय संघ के कड़े तकनीकी नियमों जैसी कई कानूनी और व्यावहारिक चुनौतियां आड़े आएंगी। इसके अलावा, अभी तक इस बात के बहुत सीमित प्रमाण हैं कि ये प्रतिबंध बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को सुधारने में कितने प्रभावी साबित होंगे, क्योंकि इस विषय पर लंबे समय का कोई व्यावहारिक अध्ययन उपलब्ध नहीं है।
