मुंबई | नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के बहुप्रतीक्षित ₹30,000 करोड़ के आईपीओ के सामने कानूनी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर एक याचिका में एक्सचेंज की लिस्टिंग प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि एनएसई में विदेशी निवेश और मॉरीशस की कंपनियों की हिस्सेदारी को लेकर पारदर्शिता की कमी है, जिसकी अगली सुनवाई 24 जून, 2026 को निर्धारित की गई है।
शेयरधारकों की केवाईसी पर सवाल
याचिका में मुख्य रूप से यह मांग उठाई गई है कि सेबी को एनएसई के बड़े शेयरधारकों के असली मालिकों (Beneficial Owners) और उनके केवाईसी दस्तावेजों को सार्वजनिक करना चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, पार्टिसिपेटरी नोट्स (P-Notes) के माध्यम से किए गए निवेश में निवेशकों की पहचान स्पष्ट नहीं है। वहीं, एनएसई ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद और निराधार बताते हुए अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखने का दावा किया है।
तकनीकी और ब्रांड जोखिमों की चेतावनी
एनएसई ने अपने ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) में निवेशकों को कई अन्य संभावित जोखिमों के प्रति भी सचेत किया है। इनमें सॉफ्टवेयर पेटेंट की कमी, ट्रेडमार्क का अधूरा पंजीकरण और एनएसई के नाम से चल रहे फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट्स द्वारा निवेशकों के साथ धोखाधड़ी का खतरा प्रमुख हैं। गौरतलब है कि यह आईपीओ पूरी तरह से ‘ऑफर फॉर सेल’ (OFS) होगा, जिसके माध्यम से पुराने निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे।

