
नयी दिल्ली, 15 जून (वार्ता) अमेरिका-ईरान के बीच हुए बड़े राजनयिक समझौते का यूरोप तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वागत किया जा रहा है और इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता लाने वाला बड़ा मोड़ माना जा रहा है लेकिन इजरायल इस समझौते का विरोध कर रहा है। इजरायल के वरिष्ठ नेताओं का साफ कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मध्यस्थता में हुआ कोई भी समझौता इजरायल को अपनी सुरक्षा के खतरों के खिलाफ कार्रवाई करने से रोक नहीं सकता।
यह नया मतभेद दिखाता है कि महीनों से चल रहे इस क्षेत्रीय संघर्ष को रोकना कितना जटिल और उलझा हुआ है। एक तरफ जहां यूरोप से लेकर एशिया-प्रशांत तक की सरकारें इस समझौते की तारीफ कर रही हैं, क्योंकि इससे तनाव कम होगा, जरूरी व्यापारिक रास्ते फिर से खुलेंगे और ईरान के परमाणु मुद्दे पर दोबारा बातचीत शुरू हो सकेगी, वहीं दूसरी तरफ, इजरायल के अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि अमेरिका-ईरान के बीच चाहे जो भी समझौता हुआ हो, इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए कदम उठाने का पूरा अधिकार रखता है। कई क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय पक्षों की मध्यस्थता के प्रयासों के बाद रविवार को घोषित इस समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने, अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष विराम जारी रखने तथा ईरान की परमाणु गतिविधियों से जुड़े पुराने विवादों को हल करने के उद्देश्य से बातचीत शुरू करने की परिकल्पना की गयी है। इस सहमति पत्र पर 19 जून को जिनेवा में आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
वैश्विक ऊर्जा बाजारों में होर्मुज जलडमरूमध्य की केंद्रीय भूमिका के कारण इस ऐतिहासिक समझौते को व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है। फारस की खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जोड़ने वाले इस संकीर्ण जलमार्ग से होकर दुनिया के तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इस संघर्ष के कारण पैदा हुई बाधाओं ने ऊर्जा की कमी, ईंधन की कीमतों में उछाल और व्यापक आर्थिक अस्थिरता की आशंकाओं को बढ़ा दिया था। फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और इटली के नेताओं ने संयुक्त बयान में इस समझौते को क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को सहारा देने का महत्वपूर्ण अवसर बताया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब पूरा ध्यान इसके क्रियान्वयन पर होना चाहिए। इन नेताओं ने संयुक्त बयान में कहा, “ अब यह बेहद जरूरी है कि विस्तृत बातचीत पूरी हो और इस समझौते को तेजी से तथा पूरी तरह से लागू किया जाये।”
चारों यूरोपीय शक्तियों ने खाड़ी क्षेत्र में मैरीटाइम सुरक्षा बहाल करने के महत्व का भी जिक्र किया। इन देशाें के नेताओं ने कहा, “यह बेहद जरूरी है कि बिना किसी शर्त या रोक-टोक के जहाजों की आवाजाही के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य तुरंत खोला जाये। हम अपने संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में रहकर इसमें अपनी भूमिका निभाने को तैयार हैं। व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा देने और समुद्र से बारूदी सुरंगें हटाने के लिए हम पूरी तरह से रक्षात्मक और स्वतंत्र मिशन चलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
इसके साथ ही, उन्होंने अपनी पुरानी बात फिर दोहरायी कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाने देना चाहिए। उन्होंने इस मुद्दे को बातचीत से सुलझाने के समर्थन के भी संकेत दिये। बयान में कहा गया है, “हम इस दिशा में अमेरिका, ईरान और आईएईए के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं। अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर साफ और जांचे जा सकने वाले कदम उठाता है, तो हम भी उसके बदले लगे प्रतिबंध हटाने को तैयार हैं।
इस समझौते को मिला समर्थन यूरोप से बाहर भी देखने को मिला। जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने शत्रुता की समाप्ति से जुड़े इस सहमति पत्र को संकट के समाधान की दिशा में बड़ा कदम बताया और उम्मीद जतायी कि इससे व्यापक समझौते का मार्ग प्रशस्त होगा।
उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट में कहा, “भविष्य में, हम दृढ़ता से उम्मीद करते हैं कि इस सहमति पत्र को निरंतरता के साथ लागू किया जायेगा, होर्मुज जलडमरूमध्य में मुक्त और सुरक्षित जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित होगी और ईरान के परमाणु मुद्दे व अन्य मामलों पर जल्द से जल्द अंतिम समझौता साकार होगा।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भी इस समझौते का स्वागत किया है और सभी पक्षों से निरंतर राजनयिक प्रयासों के इस अवसर का लाभ उठाने का आह्वान किया।श्री अल्बनीज ने कहा, “हमें इस बात की खुशी है कि अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता की बहाली की दिशा में कदम शामिल हैं। स्थिति को पूरी तरह सामान्य होने में हालांकि समय लगेगा, लेकिन हमारे क्षेत्र सहित ऊर्जा की कीमतों और अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव को कम करने के लिए इस महत्वपूर्ण गलियारे को बहाल करना बेहद आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी पुरानी चिंताओं और इससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को पैदा होने वाले खतरे का समाधान करना चाहिए।”
न्यूजीलैंड के प्रधान मंत्री क्रिस्टोफर लक्सम ने पश्चिम एशिया से बहुत दूर स्थित देशों पर पड़ने वाले इसके आर्थिक प्रभावों का उल्लेख किया और कहा कि इस संघर्ष ने प्रशांत क्षेत्र में व्यापार प्रवाह और ईंधन की लागत को प्रभावित किया था।
श्री लक्सम ने कहा, “होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने से स्थिर व्यापार मार्गों को बहाल करने, ईंधन की आपूर्ति सुचारू करने और हमारी अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाये रखने में मदद मिलेगी।”
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रहा यह समर्थन इन बढ़ती उम्मीदों को दर्शाता है कि यह समझौता व्यापक ढांचे का रूप ले सकता है, जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रॉक्सी वार और समुद्री सुरक्षा सहित क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं का समाधान करेगा।
वित्तीय बाजारों और ऊर्जा विश्लेषकों ने इन घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखी है और उनका मानना है कि तेल की आपूर्ति को स्थिर करने और दुनिया भर में मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने के लिए होर्मुज को स्थायी रूप से फिर से खोलना बेहद महत्वपूर्ण है।
ईरान ने अंतिम बातचीत में शामिल होने से पहले अमेरिका की ओर से ठोस कार्रवाइयों पर जोर देते हुए इस प्रक्रिया को सतर्कतापूर्ण समर्थन देनेका संकेत दिया है। ईरान के कानूनी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने पुष्टि की कि ईरान प्रस्तावित 60 दिनों की वार्ता अवधि को तभी आगे बढ़ायेगा, जब वह यह सत्यापित कर लेगा कि अमेरिका ने शत्रुता समाप्त करने, नाकेबंदी हटाने और ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने से जुड़ी प्रतिबद्धताओं को पूरा कर दिया है। ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सहमति पत्र को हस्ताक्षर समारोह के बाद सार्वजनिक किया जायेगा।
दुनिया भर के नेता जिसे एक दुर्लभ राजनयिक शुरुआत बताकर इसका जश्न मना रहे हैं, वहीं इजरायल ने संकेत दिया है कि वह इस समझौते को अपनी सुरक्षा स्थिति के लिए निर्णायक नहीं मानता है।
इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने इस समझौते पर सरकार की तरफ से पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया देते हुए घोषणा की कि अमेरिका-ईरान बीच तय की गयी कोई भी व्यवस्था इजरायल की सैन्य संचालन स्वतंत्रता को सीमित नहीं करेगी। श्री बेन-ग्विर ने ‘एक्स’पर लिखा, “ट्रम्प का यह समझौता हमारे लिए बाध्यकारी नहीं है। अमेरिका के अधीन इजरायल नहीं है और हम स्वतंत्र तथा संप्रभु राष्ट्र हैं।”
अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए भी उन्होंने तर्क दिया कि हिजबुल्लाह और ईरान समर्थित अन्य समूहों से मिलने वाले खतरों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए इजरायल को पूरी स्वतंत्रता बनाये रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा, “ हम इस बात पर जोर देते हैं कि हम अमेरिका से प्यार करते हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आभारी हैं। और फिर भी इजरायल कोई कमजाेर देश नहीं है।”
श्री बेन-ग्विर ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के साथ इजरायल के ऐतिहासिक अनुभवों के चश्मे से अपने विरोध को सामने रखा और तर्क दिया कि विदेशी दबाव में दी गयी रियायतों के सुरक्षा पर अक्सर प्रतिकूल परिणाम हुए हैं।
ओस्लो समझौते, 2006 के लेबनान समझौते और गाजा में संयम की अवधियों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “ हर बार जब हम इजरायल की सुरक्षा की कीमत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुके, तो हमने ब्याज सहित खून की कीमत चुकायी है। ”
उनकी यह टिप्पणी ईरान से जुड़ी वार्ताओं को लेकर अमेरिका-इजरायल संबंधों में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को बताता है। इजरायली सरकारों ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय प्रभाव को अपने अस्तित्व के लिए खतरा माना है और वे अक्सर यह रुख अपनाती रही हैं कि सहयोगियों द्वारा की जाने वाली राजनयिक पहलों की परवाह किये बिना सैन्य तैयारी और स्वतंत्र निवारक क्षमता इजरायल की सुरक्षा नीति का मुख्य आधार बना रहना चाहिए।यह मतभेद अमेरिका-ईरान समझौते के क्रियान्वयन के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों में से एक को भी दर्शाता है। इस समझौते को हालांकि इसके संभावित आर्थिक और सुरक्षा लाभों के कारण असाधारण रूप से व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है, लेकिन स्थायी सफलता न केवल अमेरिका-ईरान के इसके पालन पर निर्भर करेगी, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि संघर्ष से सीधे प्रभावित होने वाले क्षेत्रीय देश इस राजनयिक प्रक्रिया को अपनाने का विकल्प चुनते हैं या नहीं।
फिलहाल के लिए, इस समझौते ने महीनों से बढ़ते तनाव के बाद आशावाद का एक दुर्लभ क्षण पैदा किया है, लेकिन इस समझौते का पालन करने की किसी भी बाध्यता को शुरुआत में ही इजरायल का खारिज कर दिया जाना इस बात की याद दिलाता है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष विराम से स्थायी शांति तक का रास्ता अनिश्चित बना हुआ है, जहां गहरा रणनीतिक अविश्वास इस क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली देशों के समीकरणों को प्रभावित कर रहा है।
