
शाजापुर, कुछ दिन तक लकड़ी माफिया शांत थे, लेकिन अब एक बार फिर लकड़ी माफियाओं के हौसले बुलंद हैं. अवैध रूप से वृक्षों की कटाई का काम शुरू हो गया है. जहां एक तरफ एक पेड़ मां के नाम लगाया जा रहा है, वहीं सारी लकडिय़ां माफियाओं के नाम हो रही हैं. शहर में हो रहे फोरलेन चौड़ीकरण में हजारों पेड़ों की बलि चढ़ गई. ये लकडिय़ां कहां गई, पता ही नहीं है. शहर में एक बार फिर लकड़ी माफियाओं का साम्राज्य सक्रिय हो चला है.
गौरतलब है कि शाजापुर पहले ही शून्य वन क्षेत्र है. जो पेड़ बचे हैं, उन्हें लकड़ी माफिया धराशायी करने में लगे हुए हैं. पेड़ों की लगातार हो रही हत्या से पर्यावरण को तो नुकसान हो ही रहा है, लेकिन आरा मशीनों पर अवैध रूप से लकडिय़ों का भंडारण देख सकते हैं. वन विभाग अब कार्यवाही करने के बजाय लकड़ी माफियाओं का संरक्षण कर रहा है. लकड़ी माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि पिछले दिनों खुलेआम एक हरा पेड़ काट दिया था और उसकी लकडिय़ां उठाकर ले गए थे.इस मामले में न तो वन विभाग कोई ठोस कार्यवाही कर पाया और न ही प्रशासन. देर रात तक लकडिय़ों का अवैध परिवहन हो रहा है.
लकड़ी माफिया देते हैं वन विभाग को हर महीने मोटी रकम
शहर में एक दर्जन से अधिक आरा मशीनों पर खुलेआम अवैध लकडिय़ों का भंडारण होता है. इसके बदले वन विभाग को हर महीने मोटी रकम कार्यवाही न करने के लिए ये लकड़ी माफिया देते हैं. अधिकांश आरा मशीन पर खुलेआम पेड़ों की हत्या कर हरे वृक्षों की लकड़ी देख सकते हैं. अब लगता नहीं है कि शाजापुर से लकड़ी माफियाओं पर पहले जैसी कोई कार्यवाही देखने को मिलेगी.
जिस ट्रेक्टर पर तिरपाल है, मतलब अंदर अवैध लकड़ी है…
देर रात और सुबह-सुबह आपको कई ऐसे ट्रेक्टर नजर आ जाएंगे, जिनकी ट्रॉलियों पर तिरपाल लगी होती है. उसके अंदर अवैध रूप से लकडिय़ों का भंडारण होता है. ऐसा नहीं है कि वन विभाग को इसकी जानकारी नहीं है. हर महीने मोटी रकम आरा मशीनों से वन विभाग को पहुंच जाती है. कुछ दिन की सख्ती के बाद एक बार फिर लकड़ी माफिया सक्रिय हो गए हैं और उनके हौंसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें अब किसी भी कार्यवाही का जरा भी डर नहीं है.
आपदा में अवसर ढूंढ रहे लकड़ी माफिया
गैस की किल्लत के कारण जलाऊ लकड़ी की मांग बढऩे से लकड़ी माफियाओं को आपदा में अवसर मिल गया. वहीं दूसरी ओर खुलेआम बिना खौफ के प्रतिबंधित पेड़ों की अवैध कटाई की जा रही है. क्योंकि वन विभाग को इसके बदले मोटी रकम दी जाती है. इसलिए वन विभाग केवल पंचनामा बनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहा है. यदि शहर के पेड़ों को बलि से बचाना है, तो सख्त कार्यवाही की आवश्यकता है.
एक पेड़ मां के नाम लगाने से क्या फायदा.?
एक तरफ पौधारोपण किया जाता है, एक पेड़ मां के नाम अभियान चलाया जाता है और दूसरी तरफ लकड़ी माफिया हरे पेड़ों की बलि देकर ऐसे अभियानों पर पानी फेर देते हैं. यदि सही मायने में पौधारोपण और एक पेड़ मां के नाम अभियान को सफल करना है, तो वन विभाग, प्रशासन और पुलिस तीनों को संयुक्त रूप से शहर की आरा मशीनों पर आकस्मिक छापा मारकर लकड़ी माफियाओं पर सख्त कार्यवाही करना होगी, तब कहीं जाकर एक पेड़ मां के नाम अभियान और पौधारोपण की सार्थकता नजर आएगी.
