ग्वालियर:उत्तरी मध्यप्रदेश के सबसे बड़े और प्रमुख सरकारी विश्वविद्यालयों में शामिल जीवाजी विश्वविद्यालय इन दिनों गंभीर स्टाफ संकट से जूझ रहा है. 104 स्वीकृत प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर पदों में से केवल 23 पर ही शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि 81 पद वर्षों से खाली पड़े हैं. यही नहीं, उपलब्ध शिक्षकों में से चार प्रोफेसरों को अन्य संस्थानों में प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया है.
नतीजा यह है कि एक-एक प्रोफेसर के पास चार से पांच विभागों की जिम्मेदारी है. छात्र नेताओ और शिक्षकों का कहना है कि इसका सीधा असर पढ़ाई, परीक्षाओं और विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ रहा है.ग्वालियर स्थित जीवाजी विश्वविद्यालय उत्तरी मध्यप्रदेश के आठ जिलों के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र है. हर साल हजारों छात्र बेहतर शिक्षा और भविष्य की उम्मीद लेकर यहां प्रवेश लेते हैं. परिजनों का भी मानना होता है कि सरकारी विश्वविद्यालय होने के कारण यहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी, लेकिन वर्तमान हालात छात्रों की उम्मीदों पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
विश्वविद्यालय के आंकड़ों के मुताबिक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के कुल 104 पद स्वीकृत हैं. इनमें से सिर्फ 23 पदों पर शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि 81 पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं. इतने बड़े शिक्षकीय संकट के बावजूद विश्वविद्यालय का संचालन किसी तरह प्रभार व्यवस्था के भरोसे चल रहा है.शिक्षकों की कमी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई प्रोफेसरों को एक साथ चार-पांच विभागों की जिम्मेदारी दी गई है. प्रो. डीसी गुप्ता फिजिक्स, मैथेमेटिक्स और कंप्यूटर साइंस देख रहे हैं. प्रो. शांतिदेव के पास पुरातत्व, अर्थशास्त्र, पॉलिटिकल साइंस, डीसीडीसी और प्लेसमेंट सेल का जिम्मा है. प्रो. स्वर्ण परमार के पास एमबीए, बीबीए और हॉस्टल सहित कई प्रशासनिक जिम्मेदारियां हैं. प्रो. एमके गुप्ता बॉटनी, माइक्रोबायोलॉजी जैसी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं. इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई और विभागीय गतिविधियों पर पड़ रहा है
