मझगवां के तराई अंचल में फिर बीमारी फैलने का खतरा   

सतना : जिले के मझगवां विकासखण्ड के तराई अंचल के आदिवासी बाहुल्य गांव के रहवासियों के बीच जल जनित बीमारियां फैलने की घटनाएं हर वर्ष सामने आती हैं. जिसमें से कुछ प्रभावितों की मौत तक हो जाती है. गंभीर घटना होने पर जिम्मेदार अचानक सक्रिय हो जाते हैं और कुछ दिनों तक पूरा ताम-झाम भी देखने को मिलता है. लेकिन मामला ठंडा होते ही वहां के रहवासियों को फिर से उनकी नियति के भरोसे छोड़ दिया जाता है. आलम यह है कि जल संकट को लेकर मचे हाहाकार के बीच स्वच्छ जल तो दूर की बात, गंदा-मटमैला पानी तक लाने के लिए भी ग्रामीणों को लंबी जद्दोजहत करनी पड़ती है.

जिले के मझगवां विकासखण्ड मुख्यालय से महज 2 किमी की दूरी पर स्थित देवलहा ग्राम पंचायत के विश्वकर्मा टोला, मवानटोला और अहिरान टोला में इन दिनों पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. स्वच्छ पेयजल की उपलब्धतता तो सपने से भी परे है. बल्कि आलम यह है कि यहां के रहवासियों को गंदा-मटमैला पानी लेने के लिए इस चिलचिलाती धूप में लंबा सफर तय करना पड़ता है. नल-जल योजना अथवा टैंकर के माध्यम से पेयजल की सप्लाई जैसी राहत यहां पर दूर दूर तक नजर नहीं आती. यहां पर मौजूद अधिकांश हैण्डपंप काफी समय पहले से ही सूख चुके हैं.

स्थानीय जिम्मेदारों द्वारा हैण्डपंप के ऊपरी हिस्से को खोलकर उसमें मोटर डालते हुए नल जल योजना के अंतर्गत जल वितरण की जो व्यवस्था शुरु करने का प्रयास किया था वह भी अब पूरी तरह धराशायी हो चुका है. नतीजतन सूखे और आधे अधूरे हैण्डपंप रहवासियों को मुंह चिढ़ाते नजर आ रहे हैं. ब्लॉक मुख्यालय से कुछ दूरी पर ही स्थित गोडान टोला, लोटनी कोलान टोला, देवलहा और भ_न टोला में भी यही हाल देखा जा सकता है. गौरतलब है कि मझगवां क्षेत्र के यह वही इलाके हैं जहां पर हर वर्ष जल जनित बीमारियां पैर पसारती हैं. जिसके चलते जहां सैकड़ों लोग बुरी तरह बीमार पड़ते हैं वहीं कुछ को अपनी जान से हाथ धाना पड़ जाता है.
 शोपीस बना पीएचई कार्यालय
कहने को तो मझगवां विकाखण्ड में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग का कार्यालय भी है. जिसकी जिम्मेदारी केंद्र व राज्य सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं को स्थानीय स्तर पर जमीन पर उतारने की होती है. लेकिन मौजूदा समय में जबकि ब्लॉक के अधिकांश तराई क्षेत्र में पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. वहीं पीएचई द्वारा पाइपलाइन बिछाने के कार्य को अपनी उपलब्धि के तौर पर गिनाया जा रहा है. भीषण गर्मी में ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल की एक बूंद तक उपलब्ध करा पाने में नाकाम साबित हो रहा पीएचई कार्यालय न सिर्फ शो पीस बनकर रह गया है कि बल्कि यह कार्यशैली अब धीरे धीरे रहवासियों को आक्रोशित भी करने लगी है. ग्रामीणों का कहना है कि एकमात्र कुएं के जिस दूषित जल को पीने के लिए वे मजबूर हैं. उसी जल से बीमारी फैलने पर पीएचई द्वारा क्लीन चिट दे दी जाएगी.
थोड़े समय का दिखावा
मझगवां के तराई क्षेत्र के रहवासियों में पानी को लेकर मची त्राहि-त्राहि के तूल पकडऩे पर कुछ अधिकारी निरीक्षण करने पहुंचे थे. जिसके चलते एकाएक पंचायती ठेकेदारों में खलबली मच गई और आनन-फानन में जेसीबी-पोकलेन मशीनों के जरिए चौपड़े -तलैया आदि के गहरीकरण का दिखावा शुरु
हो गया. कुछ समय के लिए टैंकर भी सक्रिय नजर आए. लेकिन जिम्मेदारों के जाते ही सारी सक्रियता काफूर हो गई. नतीजतन कहीं पर आदिवासी पहाड़ी से रिस कर आने वाले पानी को बूंद बूंंंद कर जमा करते हैं तो कहीं उन्हें गंदे मटमैले पानी के लिए काफी दूर जाना पड़ता है. इतना ही नहीं बल्कि देवलहा में 100 घरों की आदिवासी बस्ती एक तलैया के दूषित मटमैले पानी पर निर्भर है. उसी पानी से नहाना, कपड़े धोना, मवेशियों को नहलाना-पानी पिलाना और स्वयं भी वही पानी पीना उनकी नियति बनी हुई है

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