टाटा पावर के कर्नाटक प्रवेश पर कर्मचारी संगठनों ने दी आंदोलन की चेतावनी

बेंगलुरु, 26 मई (वार्ता) टाटा पावर कंपनी लिमिटेड ने कर्नाटक में उन कई क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति के लिए लाइसेंस का आवेदन किया है, जहां इस समय सरकारी बिजली आपूर्ति कंपनियां बिजली आपूर्ति कर रही हैं। इस कदम से कर्मचारी संगठनों में भारी विरोध शुरू हो गया है और उन्होंने आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

अधिकारियों के अनुसार, कंपनी ने मौजूदा एस्कॉम क्षेत्राधिकारों के अंतर्गत आने वाले कई जिलों में काम करने की अनुमति मांगते हुये कर्नाटक बिजली नियामक आयोग को अपना आवेदन सौंपा है। नियामक इस प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है।

आवेदन के अनुसार, टाटा पावर की योजना कर्नाटक के 15 जिलों में वितरण कार्यों का विस्तार करने की है, जिसमें बेस्कॉम, चेस्कॉम, हेस्कॉम और मेस्कॉम के तहत आने वाले प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। कंपनी ने शहरी और नगरपालिका सीमाओं पर ध्यान केंद्रित करने का संकेत दिया है, जिसमें शहरों और व्यावसायिक रूप से लाभप्रद उपभोक्ता आधारों को लक्षित किया गया है।

इस कदम का कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड से जुड़े कर्मचारी संगठनों ने कड़ा विरोध किया है। संघ के नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि लाइसेंस को मंजूरी दी जाती है, तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जा सकता है। उनका तर्क है कि वितरण क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश से मौजूदा सरकारी कंपनियों के कामकाज और वित्तीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है।

टाटा पावर ने अपने आवेदन में अनुमान लगाया है कि यदि मंजूरी मिल जाती है, तो परिचालन शुरू होने के तीन साल के भीतर 1.86 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को बिजली वितरण सेवायें प्रदान की जाएंगी। कंपनी ने अपने परिचालन दक्षता के ट्रैक रिकॉर्ड के रूप में मुंबई, दिल्ली और ओडिशा सहित अन्य प्रमुख भारतीय बाजारों में ट्रांसमिशन और वितरण के नुकसान को कम करने के अपने अनुभव का भी हवाला दिया है।

इस प्रस्ताव ने बिजली क्षेत्र के हितधारकों के बीच एक व्यापक बहस छेड़ दी है। जहां कुछ विशेषज्ञ निजी भागीदारी को एक ऐसे कदम के रूप में देख रहे हैं जिससे दक्षता, ग्राहक सेवा और बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है, वहीं आलोचकों का तर्क है कि इससे सरकारी कंपनियों के लिए दीर्घकालिक वित्तीय तनाव पैदा हो सकता है।

यह चिंतायें भी जताई गई हैं कि निजी कंपनियां केवल मुनाफे वाले शहरी उपभोक्ताओं पर ध्यान केंद्रित कर सकती हैं, जिससे क्रॉस-सब्सिडी संरचना कमजोर हो सकती है जो वर्तमान में किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए रियायती बिजली का समर्थन करती है।

सरकारी एस्कॉम के अधिकारियों ने कहा है कि अंतिम निर्णय नियामक के पास सुरक्षित है और उन्होंने रेखांकित किया कि विद्युत अधिनियम, 2003 निजी कंपनियों को वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है।

हालांकि, उन्होंने इन चिंताओं को भी स्वीकार किया कि चुनिंदा शहरी क्षेत्रों में परिचालन से सरकारी कंपनियों का राजस्व प्रभावित हो सकता है, जिससे राज्य सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।

इस मुद्दे पर बढ़ती राजनीतिक और श्रमिक संवेदनशीलता के बीच, उम्मीद है कि नियामक आने वाले हफ्तों में विस्तृत जांच के लिए आवेदन पर विचार करेगा।

 

 

 

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