नीति आयोग की रिपोर्ट: मप्र में प्राथमिक शिक्षा में सुधार, 8वीं और 10वीं के बाद बढ़ा ड्रॉपआउट

साक्षी केशरवानी भोपाल। मप्र में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर सुधार जरूर दिखाई दे रहा है, लेकिन आठवीं के बाद बड़ी संख्या में बच्चों का स्कूल से दूर होना अब भी चिंता का विषय बना हुआ है। नीति आयोग की मई 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में पांचवीं से छठी कक्षा में पहुंचने वाले विद्यार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन आठवीं से नौवीं और दसवीं से ग्यारहवीं में जाने वाले विद्यार्थियों की दर अब भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है। यह स्थिति बताती है कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर बच्चों को स्कूल में बनाए रखना राज्य के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार देश भर में प्राथमिक से उच्च प्राथमिक यानी पांचवीं से छठी कक्षा में जाने वाले बच्चों का राष्ट्रीय ट्रांजिशन रेट 92.2 प्रतिशत है। वहीं आठवीं से नौवीं में पहुंचते-पहुंचते यह दर घटकर 86.6 प्रतिशत और दसवीं से ग्यारहवीं में 75.11 प्रतिशत रह जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उच्च कक्षाओं में पहुंचने के साथ आर्थिक दबाव, स्कूलों की दूरी, परीक्षा का तनाव और पारिवारिक जिम्मेदारियां बच्चों की पढ़ाई पर असर डालती हैं।

प्राथमिक शिक्षा में मप्र का बेहतर प्रदर्शन

मध्यप्रदेश ने प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर पिछले दस वर्षों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। वर्ष 2014 में पांचवीं से छठी कक्षा में जाने वाले विद्यार्थियों की दर 85.83 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2024 में बढ़कर 91.9 प्रतिशत हो गई। शिक्षा क्षेत्र में यह सुधार प्रदेश को तेजी से प्रगति करने वाले राज्यों की श्रेणी में लाता है।

हालांकि इस स्तर पर कुछ राज्यों ने और बेहतर प्रदर्शन किया है। आंध्र प्रदेश में यह दर 51.98 प्रतिशत से बढ़कर 94.5 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली, पुडुचेरी, चंडीगढ़, तेलंगाना और गोवा ने शत-प्रतिशत ट्रांजिशन रेट हासिल किया है।

आठवीं के बाद बढ़ रही चिंता

प्रदेश में सबसे अधिक चिंता आठवीं से नौवीं कक्षा के बीच बच्चों के स्कूल छोड़ने को लेकर है। वर्ष 2014 में यह ट्रांजिशन रेट 78.83 प्रतिशत था, जो 2024 में घटकर 77.8 प्रतिशत रह गया। यानी एक दशक में सुधार होने के बजाय गिरावट दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में माध्यमिक स्कूलों की दूरी, आर्थिक कारण, किशोरावस्था में कामकाज का दबाव और जागरूकता की कमी इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। खासकर कमजोर आर्थिक वर्ग के बच्चों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है।

इस स्तर पर पुडुचेरी और केरल 99.6 प्रतिशत ट्रांजिशन रेट के साथ देश में शीर्ष पर हैं। वहीं लक्षद्वीप, चंडीगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र भी 98 प्रतिशत से अधिक दर के साथ बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।

दसवीं के बाद हालात सुधरे, लेकिन मप्र अब भी पीछे

मध्यप्रदेश में दसवीं से ग्यारहवीं कक्षा में जाने वाले विद्यार्थियों की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ है। वर्ष 2014 में यह दर 56.6 प्रतिशत थी, जो 2024 में बढ़कर 68.9 प्रतिशत हो गई। इसके बावजूद प्रदेश अब भी देश के कम प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल है।

इस स्तर पर दिल्ली और चंडीगढ़ ने 100 प्रतिशत ट्रांजिशन रेट हासिल किया है, जबकि अंडमान-निकोबार, दादरा और नगर हवेली तथा दमन-दीव और लक्षद्वीप भी 90 प्रतिशत से अधिक दर के साथ आगे हैं।

माध्यमिक शिक्षा सबसे बड़ी चुनौती

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्राथमिक स्तर पर नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती बच्चों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक शिक्षा से जोड़े रखने की है। यदि आठवीं और दसवीं के बाद ड्रॉपआउट की स्थिति नहीं सुधरी, तो इसका असर उच्च शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास पर भी पड़ेगा।

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