उप्र विस चुनाव के पहले इंडिया समूह की एकजुटता को लेकर संशय

दिल्ली डायरी

प्रवेश कुमार मिश्र: उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि क्या इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल मुख्यरूप से सपा व कांग्रेस उत्तर प्रदेश के चुनावी रणभूमि में एकजुटता के साथ सत्ताधारी मोर्चा के खिलाफ किलाबंदी कर पाएंगे? क्या सपा व कांग्रेस के रणनीतिकार द्वारा दिल्ली, हरियाणा,पश्चिम बंगाल समेत विभिन्न राज्यों के कड़वे अनुभव को आधार बनाकर सत्ता विरोधी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए एकजुटता का ठोस फार्मूला तैयार हो पाएंगे? चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह से कांग्रेस अपने पूर्व की पराजय से बेपरवाह होकर अपने संगठनात्मक संरचना को मजबूत करने में जुटी है उससे कुछ बड़े निर्णय की आहट सुनाई दे रही है.

इतना ही नहीं सपा भी जिस तरह से अपने पारंपरिक रणनीति के अलावा चुनाव संचालित करने में मदद करने वाले प्रोफेशनल टीम के साथ बढ़ रही है उससे ऐसा लग रहा है कि सपा भी एकला चोलो को प्राथमिकता दे रही है. हालांकि दिल्ली में मौजूद दोनों दलों के रणनीतिकार गठबंधन के संदर्भ में कुछ भी कहने से बच रहे हैं लेकिन कुछ नेता मान रहे हैं कि समय का तकाजा है कि दोनों दलों के नेता अड़ियल रवैया को त्यागकर प्रांतीय स्तर पर भी इंडिया गठबंधन को मजबूत करेंगे.
अपने अपने दम पर पंजाब जीतने की कोशिश
पंजाब विधानसभा चुनाव चतुर्थकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ रहा है. पिछले चुनाव में पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच आमने-सामने की टक्कर हुई थी और बाजी आप के हाथ लगी थी. लेकिन इस बार पंजाब की राजनीतिक हालात कुछ बदल रहे हैं. चर्चा है कि भाजपा की मजबूत इंट्री ने पंजाब की राजनीति में सबसे पहले अकाली दल की ताकत कम हुई है. भाजपाई रणनीतिकारों ने अकाली दल से हाथ मिलाकर चलने के बजाय अपनी जमीनी ताकत मजबूत करने की रणनीतिक तैयारी आरंभ कर दी है. उधर कांग्रेसी रणनीतिकार भी पूर्व की गलतियों से सबक लेते हुए बहुकोणीय मुकाबला में अपनी खोई जमीन पर कब्जा करने की रणनीति बनाई है. चर्चा है कि भाजपा डबल इंजन की सरकार वाले माॅडल को पंजाबी मतदाताओं के सामने रखकर क्षेत्रीय दलों को चुनौती देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है. यानी पंजाब में चारों प्रमुख दावेदार एकला चलो की नीति से सत्ता पर काबिज होने के प्रयास में लगे हैं.
सतीशन को कमान सौंपकर कांग्रेस ने दिया बड़ा संदेश
केरल में वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री का पद सौंपकर कांग्रेस आलाकमान ने दूरगामी संदेश दिया है. इस निर्णय के बाद एकबार फिर मध्यप्रदेश का राजनीतिक प्रयोग सुर्खियों में है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि ऐसा निर्णय मध्यप्रदेश में हुआ होता तो आज मध्यप्रदेश में कांग्रेस की स्थिति कुछ और होती. राजस्थान की राजनीति भी इसी कड़ी में चर्चा का विषय बनी हुई है. इसी वजह से ज्यादातर कांग्रेसी यह कह रहे हैं कि देर आए दुरूस्त आए. इतना ही नहीं केन्द्र में बैठे नेताओं की मजबूत लाबिंग और अभेद्य कवच को जिस तरह से सतीशन ने अपनी जमीनी ताकत से तोड़ने को मजबूर किया और हाईकमान खासकर राहुल गांधी ने उसे तरजीह दी उसकी चौतरफा तारीफ भी हो रही है. कहा जा रहा है कि केरल निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि अब कांग्रेस बदलाव की ओर बढ़ चली है और यह निर्णय दूरगामी संदेश से परिपूर्ण है.
नीतीश की छाया से मुक्त होने के प्रयास में सम्राट सरकार
बिहार में जिस तरह से नीतीश युग की समाप्ति के साथ अब सम्राट युग का आगाज हुआ है उसी जल्दबाजी में भाजपा की अगुवाई वाले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छाया यानी सत्ता पर मौजूद प्रतिकात्मक दबाव से बाहर आने में जुट गई है. पिछले दिनों विभाग बंटवारे वाले सरकारी दस्तावेज में जदयू कोटा के दोनों उपमुख्यमंत्री के नाम के आगे से उपमुख्यमंत्री नहीं लिखा गया था बाद में आंतरिक हंगामे के बाद सुधारा गया. इसके बाद जितने भी होर्डिंग व बैनर इन दिनों लग रहे है उसमें से ज्यादातर बैनर से नीतीश कुमार के अलावा दोनों उपमुख्यमंत्री का फोटो गायब रह रहा है. हालांकि इस संबंध में जदयू की ओर से औपचारिक रूप से कुछ नहीं कहा जा रहा है लेकिन आंतरिक चर्चा में यह कहा जा रहा है कि सत्ता-हस्तांतरण के समय यह कहा गया था कि नीतीश कुमार की छाया यानी उसके तैयार रास्ते पर ही सरकार चलेगी. इतना ही नहीं सम्राट सरकार ने जिस तरह से अधिकारियों का तबादला आरंभ किया है वह भी बहुत कुछ कह रहा है.
टीएमसी में अंतर्कलह
पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली टीएमसी के अंदर इन दिनों शीतयुद्ध आरंभ हो गया है. हार के प्रमुख कारण के रूप में ममता के भतीजा सांसद अभिषेक बनर्जी के निरंकुश निर्णय को मानते हुए पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के अंदर ही रहकर अभिषेक के खिलाफ किलाबंदी आरंभ कर दी है. चर्चा है कि ममता के वरिष्ठ सलाहकार नेताओं ने मौजूदा समय में दल के प्रति नाराज़ हुए जमीनी नेताओं पर कठोर प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई करने से बचने की सलाह देते हुए केंद्र में नए गठबंधन बनाने के बजाय आपसी टकराव को छोड़कर इंडिया समूह को एकजुट करने में योगदान देने की सलाह दी है.

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