सीहोर। जिले में कुपोषण के खिलाफ चलाए जा रहे सरकारी अभियानों की चमकदार तस्वीरों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आ रहा है. जिला अस्पताल में महिला एवं बाल विकास विभाग तथा स्वास्थ्य विभाग द्वारा संयुक्त रूप से एक कदम सुपोषण की ओर अभियान के तहत कुपोषित बच्चों को पोषण टोकरियां वितरित की गईं. सरकारी फाइलों और प्रेस नोटों में यह आयोजन सफल बताया जा रहा है, लेकिन यदि जमीनी हालात और सरकार के ही पोषण ट्रैकर ऐप के आंकड़ों को देखा जाए तो यह पूरा अभियान केवल रस्मअदायगी और फोटो सेशन बनकर रह गया है.
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक जिले में वर्तमान में 605 बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में हैं, जिन्हें तत्काल पोषण और चिकित्सकीय देखभाल की जरूरत है. इसके बावजूद प्रशासन अस्पताल के बंद कमरों में चुनिंदा बच्चों को पोषण टोकरी बांटकर सुपोषण अभियान की सफलता का दावा कर रहा है.
सबसे बड़ा सवाल पोषण ट्रैकर ऐप की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहा है. केंद्र सरकार के इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आंगनबाड़ी स्तर से बच्चों के वजन और ऊंचाई की एंट्री की जाती है. आरोप है कि कई स्थानों पर लक्ष्य पूरा करने के दबाव में आंकड़े वास्तविकता से अलग दर्ज किए जा रहे हैं. ऐप में जो बच्चे सामान्य या कम कुपोषित दिखाए जाते हैं, वही बच्चे जब जिला अस्पताल पहुंचते हैं तो वे गंभीर तीव्र कुपोषण (सेम) की स्थिति में पाए जाते हैं. इससे साफ जाहिर होता है कि कागजों और ऐप पर दिखाई जा रही तस्वीर और धरातल में भारी अंतर है.
जानकारों का कहना है कि आंकड़ों की इस बाजीगरी से अधिकारी अपनी उपलब्धियां तो गिना देते हैं, लेकिन असल समस्या जस की तस बनी हुई है. जब बजट आता है तो अस्पताल में कुछ टोकरियां बांटकर अभियान की सफलता का प्रचार कर दिया जाता है, जबकि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कुपोषित बच्चों तक नियमित पोषण आहार और स्वास्थ्य सेवाएं अब भी नहीं पहुंच पा रही हैं.
अस्पताल में हुए कार्यक्रम ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और नीयत दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. जिले में बड़ी संख्या में बच्चे एनीमिया और कुपोषण से पीडि़त हैं. ऐसे में क्या केवल एक औपचारिक आयोजन से पूरे जिले की तस्वीर बदल सकती है? ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई परिवार ऐसे हैं जहां बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा, लेकिन विभागीय अमला आंकड़ों और आयोजनों में व्यस्त नजर आता है. इस संबंध में महिला एवं बाल विकास विभाग का कहना है कि एक कदम सुपोषण की ओर अभियान के तहत समय-समय पर पोषण टोकरी वितरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. सीडीपीओ शहरी बीएल मालवीय के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण स्तर में सुधार लाना है. उन्होंने बताया कि बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण भी किया गया. कार्यक्रम में सीडीपीओ ग्रामीण प्रियंका दीवान सहित कर्मचारी उपस्थित रहे.हालांकि सवाल अब भी यह है कि क्या सिर्फ टोकरियां बांटने और फोटो खिंचवाने से कुपोषण जैसी गंभीर समस्या का समाधान संभव है, या फिर प्रशासन को अब जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई करने की जरूरत है.
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर एंट्री का दबाव
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर पोषण ट्रैकर ऐप में शत-प्रतिशत एंट्री का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि उन्हें न तो पर्याप्त तकनीकी संसाधन उपलब्ध हैं और न ही कई क्षेत्रों में इंटरनेट नेटवर्क की सुविधा. परिणामस्वरूप, कई बार जल्दबाजी में या लक्ष्य पूरा करने के लिए गलत आंकड़े अपलोड कर दिए जाते हैं. यही कारण है कि सरकारी रिकॉर्ड में सुपोषण दिखाई देता है, लेकिन जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्रों में आज भी कुपोषित बच्चों की संख्या कम नहीं हो रही.
