
विंध्य की डायरी, डा. रवि तिवारी। कांग्रेस पार्टी ने आगामी निकाय एवं विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से कमर कस ली है और संगठनात्मक ढांचे को मैदानी स्तर पर मजबूत करने के लिये नये-नये प्रयोग कर रही है. व्यक्तिवाद और गुटबाजी में उलझी कांग्रेस को मैदानी स्तर पर मजबूत बनाने के लिये विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति की गई है जो संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा कर बूथ स्तर पर संगठन को खड़ा करेगे. कई ऐसे प्रभारी है जो खुद तो मैदान में चुनाव नहीं जीत पाए, अध्यक्ष रहते हुए भी संगठन को मजबूत नही कर पाये और अब पार्टी का बेड़ा पार कैसे करेंगे ? खुद गुटबाजी में उलझे हुए प्रभारी कार्यकर्ताओं का क्या मार्गदर्शन करेंगे ? छत्रपो के इर्दगिर्द कार्यकर्ताओं की राजनीति होती है और मैदान में संगठन को मजबूत बनाने के लिये निष्ठाभाव से काम करने वाले नेताओ की कमी कांग्रेस में है. यह कोई पहला प्रयोग नही है इसके पहले भी विधानसभा स्तर पर प्रभारी संगठन की नब्ज टटोलते रहे है और एकता-अनुशासन का पाठ भी
पढ़ाया पर नतीजा सबके सामने है. प्रभारी ने ब्लाकों में पहुंचकर बैठके ली, जहा गुटबाजी साफ तौर पर देखने को मिली. सुझाव सामने आए तो समस्याएं भी रखी गई और प्रभारियों ने अपने स्तर पर सुझाव और समस्याओं को ऊपर तक पहुंचाने का आश्वासन भी दिया पर नतीजा सभी को पता है. जब तक बूथ स्तर पर संगठन नहीं खड़ा होगा तब तक कांग्रेस की नैय्या हिलकोरे लेती रहेगी.
किसी ने पकड़ा ई-रिक्शा तो कोई चला बस से
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पेट्रोल-डीजल की बचत को लेकर की गई अपील के बाद राजनीतिक गलियारे में बहस छिड़ गई है. आम जनता के साथ-साथ नेताओं द्वारा भी ईधन बचाने की वकालत की जा रही है. विंध्य में इसका अनुपालन देखने को भी मिला. उदाहरण के तौर पर विंध्य के कई माननीय सांसद-विधायक ई-रिक्शा और सार्वजनिक बस में सफर करते नजर आए. तो वही दूसरी तरफ कई नेताओ की गाडिय़ों के पीछे काफिला भी चलता नजर आया. पीएम मोदी की अपील का असर मैदानी स्तर पर सार्थक नजर नही आ रहा. दिखावे के लिये सांसद-विधायक ई-रिक्शा, बसों में तो सफर कर फोटो खिचवा रहे है पर वास्तविकता इससे अलग है. कई नेताओं ने साइकल पर सफर कर फोटो खिचवाई और सोशल मीडिया में पोस्ट कर दी. ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने पीएम मोदी की अपील कही मजाक बनकर न रह जाय. भाजपा के नेता खुद लग्जरी वाहनो से सफर करते नजर आ रहे है. नेताओ के पीछे कार्यकर्ताओ की गाडिय़ां फर्राटे मारते हुए चल रही है. अब सवाल यह उठता है कि बचत कहां है. कई माह पूर्व रीवा कमिश्नर बी.एस जामोद ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर सुमंगल साइकिल अभियान शुरू किया था. तब से वह संभागीय अधिकारियों के साथ हर मंगलवार को साइकिल से ही कार्यालय पहुंचते है. लेकिन अन्य जिलो में यह अभियान दम तोड़ चुका है.
भरोसे का प्रतीक बनी जनसुनवाई
जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिये हर मंगलवार को जनसुनवाई कलेक्टर कार्यालय से लेकर सभी कार्यालयों में होती है. जनसुनवाई प्रशासनिक औपचारिकता बनकर दम तोड़ चुकी है, आवेदन देने के बाद केवल तारीख पर तारीख मिलती है निराकरण नहीं होता पर रीवा में नवागत कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी के पदभार सम्भालने के साथ उनकी कार्यशैली पर जनता ने अटूट विश्वास जताया. यही वजह है कि जनसुनवाई भरोसे का प्रतीक बनती जा रही है. मंगलवार को कलेक्टे्रट में जनसुनवाई में जन सैलाब उमड़ पड़ा. शायद इतनी भीड़ किसी नेता के आने पर भी नही होती. कहीं न कहीं यह कलेक्टर के प्रति जनता का विश्वास है. आवेदन के साथ मौके पर निराकरण करने वाले कलेक्टर विश्वास का प्रतीक बन चुके है. इसके साथ ही दूसरा पहलु यह है कि निचले स्तर पर निराकरण न होने के कारण जनता अपेक्षा लेकर कई किलो मीटर सफर तय कर कलेक्टर की चौखट पहुंचती है. मतलब साफ है कि नीचे के अधिकारी समस्याओं को लेकर संवेदनशील नहीं है.
