राजनीति की भाषा ऐसी हो गई कि आज तो गांधी भी चुनाव हार जाएं: झा

इंदौर। प्रसिद्ध चिंतक, विचारक और सांसद मनोज कुमार झा ने कहा है कि हमारे देश में राजनीति की भाषा ऐसी हो गई है कि आज यदि महात्मा गांधी होते और वह चुनाव लड़ लेते तो वह भी हार जाते। राजनेता केवल इवीएम की भाषा समझते हैं और भाषा इवीएम को नहीं समझती है। राजनीति की भाषा तो हर दिन के साथ खराब होती जा रही है लेकिन भाषा को लेकर चल रही राजनीति भी मन को दुखा रही है।

वे आज शाम यहां जाल सभागृह में अभ्यास मंडल के द्वारा आयोजित 66 वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यान माला में राजनीति की भाषा और भाषा की राजनीति विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आज हमारे देश की जनता को नेता के रूप में आक्रामक नेता चाहिए होता है। हम यह नहीं सोचते हैं कि हम अपना नुमाइंदा चुन रहे हैं, कोई पहलवान नहीं चुन रहे हैं। अब तो हालत यह हो गई है कि यदि 1920 के दौर वाले गांधी जी भी आ जाए तो आज के हालात को देखकर वे चुनाव नहीं लड़ेंगे और यदि लड़ेंगे तो उनकी जमानत जप्त हो जाएगी। राजनीति की इस बदलती भाषा के लिए हम सभी गुनहगार हैं। लोकतंत्र में भाषा की गिरावट में कोई पार्टी पीछे नहीं है। पहले एक समय था जब यदि युवावस्था में भी किसी के मुंह से अपशब्द निकल जाता तो वह दोस्तों को पसंद नहीं आता था। आज तो इसी अपशब्द ने सम्मान की जगह ले ली है।

उन्होंने कहा कि चुनावी लड़ाई में यदि भाषा को गिराना पड़े तो उससे बाज आना चाहिए। बांटने और काटने की भाषा से समाज बंटता है। देश की आजादी के समय पर जो विभाजन की लकीर दो देशों के बीच में खींची गई थीं। वह लकीर आज हर मोहल्ले में नजर आ रही है। हमारे संविधान की भाषा स्पष्ट है उस भाषा के स्थान पर आज सारे आम गाली दी जा रही है। अब तो सरकार की आलोचना मतलब देश की आलोचना हो गया है। यह स्थिति 50 साल पहले भी आपातकाल के समय पर बनी थी और आज फिर वही स्थिति बन रही है। कोई भी व्यक्ति भारत नहीं हो सकता है क्योंकि भारत विशाल हृदय की सोच है।

उन्होंने कहा कि यदि अब भी हम अपनी संस्थागत संरचना को बचा नहीं पाए तो मुश्किल होगी। हाल ही में हुए बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव में घुसपैठिए, अर्बन नक्सल जैसे शब्द खूब जमकर गूंजाए गए। जब किसी जमीन पर किसी बड़े व्यक्ति की नजर पड़ जाती है तो उस जमीन को बचाने के लिए जो आवाज उठाएगा वह अर्बन नक्सली करार दिया जाता है। हमारे देश का मानस टूट गया है। आज हमारे देश में सांझा छत तो है लेकिन सकून नहीं है। जब तक सांझ सोच और सांझ सपना नहीं होगा तब तक देश तरक्की नहीं कर पाएगा।

प्रो झा ने कहा कि भाषा के विवाद में देश ने काफी कुछ खोया है। हिंदी पखवाड़े से हिंदी बड़ी भाषा नहीं बनी है बल्कि लोक माध्यम से हिंदी बड़ी भाषा बनी है।‌ भाषा हमारे जीवन के माध्यम है। राजनीति के लोग भाषा नहीं इवीएम देखते हैं और भाषा को इवीएम नहीं दिखती है। आज समस्या यह है कि जो ओहदेदार हैं वह अभ्यास नहीं करते, मंडल बनाकर बैठ गए हैं। कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि का स्वागत श्याम सुंदर यादव, रामबाबू अग्रवाल, अन्ना दुराई, नेहा जैन, इशाक चौधरी, अंजेश ने किया। कार्यक्रम का संचालन मनीष भालेराव ने किया। अतिथि को स्मृति चिन्ह अनिल त्रिवेदी और ओ पी गोयल ने भेंट किए। अंत में आभार प्रदर्शन अरविंद तिवारी ने किया।

*आज का व्याख्यान*

अभ्यास मंडल की इस व्याख्यान माला में कल सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के मध्य प्रदेश के प्रभारी डॉ महेंद्र सिंह का व्याख्यान रखा गया है। उनके विषय होगा भारत दृष्टि 2047। यह व्याख्यान शाम 6:00 बजे जाल सभागृह में आयोजित किया गया है।

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