नई दिल्ली 16 मई (वार्ता) प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर को अभूतपूर्व सैन्य अभियान बताते हुए कहा है कि इस अभियान ने भारत की युद्ध रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया है। उन्होंने कहा कि यह अभियान भूमि, वायु, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्रों में समन्वित कार्रवाई के माध्यम से चलाया गया।
जनरल चौहान ने शनिवार को यहां मानेकशॉ सेंटर में आयोजित एक संवाद सत्र में कहा कि यह अभियान भारत के अब तक के किसी भी संघर्ष से अलग था। उन्होंने कहा कि यह पहला मल्टी डोमेन ऑपरेशन था। उन्होंने कहा कि इसमें तीनों सेनाओं ने समन्वय के साथ काम किया और अभियान में मुख्यतः गैर-संपर्क युद्ध और अंतरिक्ष तथा साइबर जैसी नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया गया।
सेना प्रमुख ने कहा कि यह ऑपरेशन केवल 88 घंटे तक चला और इस दौरान सशस्त्र बलों, सरकारी एजेंसियों और अन्य संस्थानों के बीच व्यापक समन्वय आवश्यक था। उन्होंने कहा, “यहां तक कि जीत के मापदंड भी अलग थे। कल्पना कीजिए कि 300 या 400 किलोमीटर दूर से इस कमरे में सटीक रूप से आकर कोई चीज गिरे। यह हमारे लिये अभूतपूर्व था।”
जनरल चौहान ने अपने करियर पर भी चर्चा की और कहा कि मणिपुर और जम्मू-कश्मीर के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में उनकी तैनाती अत्यंत सार्थक रही। उन्होंने कहा कि उन्होंने मणिपुर के सेनापति जिले और जम्मू कश्मीर के बारामूला में ब्रिगेड का नेतृत्व किया।
उन्होंने कहा, ” वहां से 15-20 साल पहले जाने के बावजूद लोग मुझे याद करते हैं और किसी भी समस्या पर मुझे फोन करते हैं।” उन्होंने बारामूला में लोगों से फिर से जुड़ने को अत्यंत संतोषजनक बताया।
जनरल चौहान ने दो सीमावर्ती गांवों निलांग और जादांग, की पुनर्वास प्रक्रिया में मदद को अपनी सबसे संतोषजनक उपलब्धियों में से एक बताया, जिन्हें 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद खाली किया गया था। उन्होंने याद किया कि ग्रामीणों ने अपने पैतृक गांव लौटने में मदद मांगी थी, जहां उनके मंदिर अब भी मौजूद थे।
उन्होंने मेजर बॉब खथिंग की विरासत को जीवित करने की बात भी कही, जिन्होंने 1951 में तवांग को भारत के लिए सुरक्षित किया था। जनरल चौहान ने बताया कि मेजर खथिंग की स्मृति में तवांग में एक संग्रहालय स्थापित किया गया, जिसमें तत्कालीन असम के राज्यपाल बी.डी. मिश्रा और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का सहयोग रहा।
कुछ अन्य बातें साझा करते हुए प्रमुख रक्षा अध्यक्ष ने कहा कि वह एक गैर-सैनिक परिवार से आते हैं और संयोगवश सशस्त्र बलों में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि उन्हें फोर्ट विलियम के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई के दौरान नियमित रूप से गोरखा बटालियन को देखकर प्रेरणा मिली थी।
जनरल चौहान ने कहा कि उनके मित्र सुजीत घोष राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए ) में आवेदन के लिए फार्म लेकर आये थे लेकिन कम उम्र होने के कारण वह फार्म नहीं भर सके इसलिए उन्होंने अपना फार्म मुझे दे दिया। जनरल ने कहा, “उन्होंने वह फॉर्म मुझे दिया। मैंने उसे भरकर अकादमी जॉइन किया, और इस तरह मैं आज यहाँ हूँ। ”
