भुवनेश्वर, 24 अप्रैल (वार्ता) ओडिशा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि अधिकारी बीते युग की ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। उन्हें नागरिकों के साथ गुलामों की तरह नहीं, बल्कि गरिमा के साथ व्यवहार करना सीखना चाहिए। उनके सभी कार्य मानवीय मूल्यों और करुणा से निर्देशित होने चाहिए।
न्यायालय ने सरकारी मुद्रण, लेखन सामग्री और प्रकाशन विभाग के 105 नियमित कर्मचारियों की नियुक्ति को निलंबित करने और उन्हें फिर से ‘अस्थाई कर्मचारी’ बना देने के फैसले को रद्द करते हुए यह आदेश दिया। नौकरशाही की मनमानी का यह मामला 1994 का है। कटक के मुद्रण निदेशक ने 1992-93 के दौरान साक्षात्कार के बाद 105 लोगों को नियुक्त किया था, जिन्हें 1994 में नियमित कर दिया गया था लेकिन कुछ ही समय बाद एक अन्य आदेश के जरिए उनके नियमितीकरण को निलंबित कर उन्हें फिर से ‘अस्थाई कर्मचारी’ बना दिया गया।
न्यायमूर्ति कृष्ण श्रीपाद दीक्षित और न्यायमूर्ति चित्तरंजन दास की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि निदेशक ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का हिस्सा हैं। पीठ ने कड़े शब्दों में कहा, “अधिकारियों को अपनी औपनिवेशिक मानसिकता की नींद से जागना चाहिए और नागरिकों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करना सीखना चाहिए।”
न्यायालय ने निर्देश दिया है कि वर्तमान में सेवा में मौजूद सभी 26 कर्मचारियों को 1994 के नियमितीकरण आदेश के अनुसार वित्तीय लाभ दिए जाएं। इसके अलावा, जो 57 कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं और जिन 21 कर्मचारियों का निधन हो गया है, उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को भी यह लाभ दिया जाएगा।
न्यायालय ने यह भी कहा कि जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं या जिनका निधन हो गया है, सरकार और निदेशक को निर्देश दिया गया है कि वे उनके कानूनी वारिसों की पहचान करें और तीन महीने के भीतर उनके बैंक खातों में वित्तीय लाभ हस्तांतरित करें, तथा न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को अनुपालन की रिपोर्ट प्रस्तुत करें। किसी भी चूक या देरी की स्थिति में, पहले महीने के लिए एक प्रतिशत और उसके बाद के प्रत्येक महीने के लिए दो प्रतिशत की दर से ब्याज लगेगा, जिसकी वसूली दोषी सरकारी अधिकारियों से की जाएगी।
