आशीष कुर्ल
भोपाल। राज्यसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, लेकिन पर्दे के पीछे राजनीतिक हलचल शुरू हो चुकी है।
जून 2026 में मप्र से तीन सीटें खाली होने जा रही हैं, जिससे मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच हाई-वोल्टेज टकराव का रूप लेता दिख रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की सीट है, जो कांग्रेस की साख की बड़ी परीक्षा बनती जा रही है।
कांग्रेस के भीतर आंतरिक समीकरणों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को लेकर संकेत हैं कि वे इसे अपनी अंतिम राजनीतिक पारी के रूप में देख रहे हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि केवल उनका नेतृत्व ही क्रॉस-वोटिंग को रोक सकता है, जिससे यह चुनाव रणनीतिक के साथ-साथ भावनात्मक भी बन गया है। छिंदवाड़ा से उठ रही आवाज़ें क्या पार्टी हाईकमान के लिए अल्टीमेटम हैं?
इसी बीच अरुण यादव और डॉ. मुकेश नायक के नाम संभावित उम्मीदवारों के तौर पर सामने आए हैं। साथ ही, यह अटकलें भी तेज हैं कि आखिरी समय में हाईकमान का कोई ‘सरप्राइज चेहरा’ मैदान में उतारा जा सकता है। समानांतर रूप से ‘दलित कार्ड’ खेलने की रणनीति पर भी विचार हो रहा है। मायावती और चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए फूल सिंह बरैया को मैदान में उतारने की चर्चा है, हालांकि इससे कमलनाथ खेमे में असंतोष बढ़ने का खतरा भी है।
वहीं, भाजपा खेमे में सतह पर शांति नजर आ रही है, लेकिन रणनीतिक स्तर पर तैयारियां तेज हैं। दिल्ली में पार्टी रणनीतिकारों के ‘क्लीन स्वीप’ प्लान पर काम करने की चर्चा है, जिसके तहत तीनों सीटों पर कब्जा कर कांग्रेस को राज्यसभा से पूरी तरह बाहर करने की कोशिश की जा सकती है।
इस बीच यह भी स्पष्ट नहीं है कि दिग्विजय सिंह के इनकार के बावजूद क्या उन्हें फिर से मौका मिलेगा ? या फिर जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष के नाते मौका मिलेगा। संख्या बल भाजपा के पक्ष में झुकता दिख रहा है और क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं के बीच कांग्रेस निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
भोपाल की सियासत में बढ़ती अनिश्चितता के बीच यह मुकाबला अब सिर्फ गणित तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह विरासत और मजबूरी के बीच की जंग बन गया है जिसका परिणाम प्रदेश की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
