‘शून्य’ से लेकर 5,868 करोड़ रुपये तक, तमिलनाडु-बंगाल में ऐसी है उम्मीदवारों की आर्थिक स्थिति

नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (वार्ता) तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव में ‘शून्य संपत्ति’ से लेकर अरबों रुपये के मालिक उम्मीदवारों तक विभिन्न आर्थिक पृष्ठभूमि के सैकड़ों प्रत्याशी मैदान में हैं।

तमिलनाडु की 234 सीटों पर लगभग 4,023 उम्मीदवारों तथा पश्चिम बंगाल में पहले चरण के तहत 152 सीटों पर 1,478 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला गुरुवार को होगा। इनमें अन्नाद्रमुक की लालगुडी सीट से उम्मीदवार लीमा रोज मार्टिन सबसे धनी उम्मीदवारों में शामिल हैं, जिनकी घोषित संपत्ति 5,868 करोड़ रुपये से अधिक है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और पश्चिम बंगाल इलेक्शन वॉच के अनुसार, राज्य में सबसे अमीर उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के जंगीपुर सीट से उम्मीदवार जाकिर हुसैन हैं। उनकी घोषित संपत्ति करीब 133 करोड़ रुपये है। दुर्गापुर पूर्वा सीट से आम जनता उन्नयन पार्टी की उम्मीदवार रुबिया बेगम के खाते में लगभग 500 रुपये ही हैं।

एडीआर के विश्लेषण के अनुसार, पश्चिम बंगाल में प्रति उम्मीदवार औसत संपत्ति 1.34 करोड़ रुपये है और 1,475 उम्मीदवारों में से 309 (21 प्रतिशत) करोड़पति हैं।

इसके मुकाबले तमिलनाडु में प्रति उम्मीदवार औसत संपत्ति 5.17 करोड़ रुपये है, जबकि शीर्ष तीन उम्मीदवारों की कुल संपत्ति करीब 7,000 करोड़ रुपये है। वर्ष 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में यह औसत 1.72 करोड़ रुपये था।

तमिलनाडु में लीमा रोज मार्टिन के बाद अभिनेता से राजनेता बने विजय (टीवीके) का स्थान है, जिनकी घोषित संपत्ति 648 करोड़ रुपये से अधिक है। इसके बाद चेन्नई के विल्लीवक्कम से उम्मीदवार आधव अर्जुन हैं, जिनकी संपत्ति 534 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है।

एडीआर के अनुसार, तमिलनाडु में 100 करोड़ रुपये से अधिक संपत्ति वाले उम्मीदवारों में कांग्रेस के 28 में से दो (सात प्रतिशत), द्रमुक के 175 में से सात (चार प्रतिशत), अन्नाद्रमुक के 170 में से तीन (दो प्रतिशत), पट्टाली मक्कल काची के 18 में से एक (छह प्रतिशत), अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम के 11 में से एक (नौ प्रतिशत) और तमिलगा वेत्रि कषगम के 231 में से आठ (तीन प्रतिशत) उम्मीदवार शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनावों में धनबल का प्रभाव लगातार बना हुआ है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में यह प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। चुनाव खर्च में वृद्धि, आर्थिक विकास और मजबूत कारोबारी ढांचे के कारण अधिक संपन्न उम्मीदवार राजनीति में आ रहे हैं, जबकि राजनीतिक दल भी ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देते हैं जो अपने चुनाव अभियान का खर्च वहन कर सकें।

विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण भारत में रियल एस्टेट, निर्माण, परिवहन और फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों की राजनीति में भागीदारी अधिक है, जहां पहले से ही धन का संकेंद्रण अधिक होता है। पारिवारिक राजनीतिक नेटवर्क और स्थानीय नेतृत्व की मजबूत संरचना भी संपन्न उम्मीदवारों के लिए राजनीति में प्रवेश को आसान बनाती है।

एडीआर के अनुसार, “चुनावों में धनबल की भूमिका इस तथ्य से स्पष्ट है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल संपन्न उम्मीदवारों को टिकट देते हैं,” जो राजनीतिक परिदृश्य में उच्च आय वर्ग के उम्मीदवारों के वर्चस्व को दर्शाता है।

 

 

 

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