नयी दिल्ली, 20 अप्रैल (वार्ता) उच्चतम न्यायालय सोमवार को राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की प्रधान पीठ और अन्य पीठों द्वारा समाधान योजनाओं को मंजूरी देने में हो रही अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और इसे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
शीर्ष अदालत ने एनसीएलटी की प्रधान पीठ नयी दिल्ली और भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) दोनों को निर्देश दिया कि वे मंजूरी के लिए लंबित आवेदनों और देरी के कारणों पर पूरे देश का विस्तृत डेटा उपलब्ध कराएं।
अदालत दिवाला की कार्यवाही से जुड़े एक विवाद की सुनवाई कर रहा है, जिसमें आईआईएफएल के 85 करोड़ रुपये के दावे को शुरू में 2020 में पेशेवरों ने खारिज कर दिया था। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण ने इसे बाद में मंजूर कर लिया और 2023 में राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने इसे सही ठहराया, जिसके बाद शीर्ष अदालत में अपील की गई।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें एक योजना लगभग दो सालों से लंबित पड़ी थी।
अदालत ने एनसीएलटी की प्रधान पीठ नयी दिल्ली और आईबीबीआई दोनों को निर्देश दिया कि वे मंजूरी के लिए लंबित आवेदनों और देरी के कारणों पर पूरे देश का विस्तृत डेटा उपलब्ध कराएं।
अदालत ने संकेत दिया कि जब समाधान योजनाएं मंजूरी के लिए आती हैं, तो एनसीएलटी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उसे समय पर मंजूर करे, अन्यथा आईबीसी का वह उद्देश्य ही विफल हो जाएगा, जिसके तहत सीआईआरपी को एक तय समय-सीमा के भीतर पूरा किया जाना है।
अदालत ने एनसीएलटी की प्रधान पीठ को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द दो तरह की जानकारी उपलब्ध कराए। पहली समाधान योजनाओं की मंजूरी के लिए कितने आवेदन लंबित हैं और दूसरी, ये आवेदन कितने समय से लंबित पड़े हैं।
अदालत ने यह भी पूछा कि मंजूरी के इन आवेदनों पर अब तक कोई फैसला क्यों नहीं लिया गया है।
